
गेहूं रोकने की धमकी, पोखरण के समय सैंक्शन और अब हैवी टैरिफ की धौंस... इतिहास गवाह है अमेरिकी प्रेशर के आगे नहीं झुका है भारत!
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अमेरिका राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन की धमकी से बिना डरे भारत के तत्कालीन पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने कहा,
अमेरिकी दादागीरी का जवाब भारत ने हमेशा सामने से दिया है. न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का ये सरदार दुनिया को हमेशा अपने चश्मे से देखता है. इसने विश्व के मामलात को कभी न्याय और निष्पक्षता के तराजू पर नहीं तोला. 1947 में आजाद हुआ भारत जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गुट निरपेक्ष नीति पर चला तो अमेरिका तिलमिला कर रह गया. ये नए-नए स्वतंत्र हुए भारत की आजाद और दबाव मुक्त विदेश नीति की पहली मुनादी थी.
तब से लेकर आज तक भारत ने अपनी फॉरेन पॉलिसी में स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है. एक वैश्विक महाशक्ति होने के नाते अमेरिका बार-बार भारत पर अपनी नीतियों को लागू करने के लिए आर्थिक, कूटनीतिक या सैन्य दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है. फिर भी भारत ने कई महत्वपूर्ण मौकों पर इन दबावों के आगे न झुकते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखा और यूएस पॉलिसी मेकर्स को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति विदेशी ऑडियंस को खुश करने के लिए नहीं बनाता है.
अब जरा सोचिए, भारत पाकिस्तान के साथ युद्ध के बीच में है. इंडिया अपनी जनता को रोटी देने के लिए अमेरिकी गेहूं पर निर्भर है. इसी दौरान अमेरिका से धमकी आती है कि युद्ध बंद कीजिए नहीं तो गेहूं रोक दिया जाएगा. भारत से जवाब आता है रोक दीजिए. फर्क नहीं पड़ता है. 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने एक बार फिर भारत पर आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगा दिया. इस बार भी भारत डिगा नहीं. आइए इतिहास बदल देने वाले इन घटनाओं को समझें.
1956 का युद्ध और हमारी रोटी पर अमेरिका की नजर
1962 के भारत चीन जंग से पहले ही भारत की स्थिति अच्छी नहीं थी. जब लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने तब भारत खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरूक नहीं हुआ था. देश में रोटी के लाले थे. खाने का संकट था. 1965 में मॉनसून कमजोर रहा. देश में अकाल की नौबत आ गई. इसी दौरान मौके का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने भारत हमला कर दिया.
5 अगस्त 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक एलओसी पार करके कश्मीर में घुस आए. भीषण जंग हुई. भारत की सेना लाहौर तक पहुंच गई थी.

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