
गजब! शिवजी के साथ बना डाली 'तड़पाओगे तड़पा लो' गाने पर रील... लेकिन, भक्ति के इस तरीके को क्या कहा जाए
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एक 'देवी जी' सोशल मीडिया के इसी ट्रेंडी गाने को शिवालय में गाते-गुनगुनाते नजर आईं. वह लिंग स्वरूप शिव जी को संबोधित करते हुए बार-बार गुनगुनाते हुए कह रही थीं कि 'चाहे जितना मर्जी तड़पा लो और ठुकरा लो, लेकिन हम तुम्हारे दर पर आना नहीं छोड़ेंगे.'
कहते हैं न पुराना जमाना लौट-लौट के आता है, और रीलबाजों से भरी इस दुनिया में लाइक्स, व्यूज और कॉमेंट्स की चाहत ऐसी कि कंटेंट नए पैकेट में पुराना सामान हो चुका है. दुनिया इतनी रंगीन हो चुकी है कि जब तक आप फिरोजी, पीच और क्रिमसन में रंगभेद समझ पाएं तब तक इनके कई नए शेड मार्केट में आ जाते हैं. लेकिन, इसी बीच कानों में रस घोलने लगा है ब्लैक एंड व्हाइट एरा का एक गीत.
गीत है 'तड़पाओगे, तड़पालो, हम तड़प-तड़प कर भी तुम्हारे तुम्हारे गीत गाएंगे' इस गीत को आज लगभग 68 साल हो चुके हैं, लेकिन दिल्ली-NCR के जाम में फंसे हुए, बारिश के जलभराव से जूझते हुए और मेट्रो की भीड़-भाड़ में खटते हुए दफ्तर से घर और घर से दफ्तर पहुंचते हुए सिर्फ इतनी ही लाइनें कानों में बज रही हैं वो भी सिर्फ सोशल मीडिया के रील्स वाले दौर की बदौलत.
मोबाइल की स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए हर दूसरी रील में कन्याएं बड़े ही ठुनकते अंदाज में इस बुजुर्ग हो चुके गीत के सहारे दम भर रही हैं कि वे तड़पाए और ठुकराए जाने के बावजूद उसके दर पर आना नहीं छोड़ेंगी, जो उनको बहुत प्यारा है. बीते दिनों नीले ड्रम और हनीमून हत्याकांड के चर्चा में रहने के बाद इस तरह के गीत ने थोड़ा ही सही लेकिन सुकून तो दिया ही है. थके-मांदे मिडिल क्लास आदमी को इस तंग होती जा रही दुनिया में और क्या ही चाहिए.
क्यों चर्चा में है एक पुराना गीत? खैर, ये गीत ट्रेंडिग में तो था ही, लेकिन मंगलवार-बुधवार के इस दरमियानी समय में चर्चा में भी आ गया. ट्रेंड में रहना अलग बात है और चर्चा में रहना अलग. चर्चा में थोड़ा वाद-विवाद का पुट भी रहता है, खासतौर पर तब, जब मामला धार्मिक एंगल ले जाए. हुआ यूं कि एक 'देवी जी' सोशल मीडिया के इसी ट्रेंडी गाने को शिवालय में गाते-गुनगुनाते नजर आईं. वह लिंग स्वरूप शिव जी को संबोधित करते हुए बार-बार गुनगुनाते हुए कह रही थीं कि 'चाहे जितना मर्जी तड़पा लो और ठुकरा लो, लेकिन हम तुम्हारे दर पर आना नहीं छोड़ेंगे.'
उनके इस 'भजन' में भाव कितना था और भक्ति कितनी, इसे नापा नहीं जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया पर रील बनते ही मामला उछाल ले गया. इसी के साथ ये गीत दूनी रफ्तार से सुना गया और बेशक, इसी के साथ इस यूजर रील मेकर सोशल मीडिया दीवा के हैंडल पर लाइक-कॉमेंट्स भी बढ़े होंगे. उन्होंने जो शिवालय में किया, उसे किस श्रेणी में रखा जाए, यह अलग लेवल का प्रश्न है.
प्रश्न है कि क्या इसे नवधा भक्ति में रखा जा सकता है? क्या इसे सहज भाव वाली पूजा में शामिल किया जाना चाहिए? क्या भगवान के साथ इतना ओपन होना ठीक है? हालांकि इस रील को लेकर तमाम लोग नैतिक-अनैतिक जैसी बात कह रहे हैं, फिर भी ध्यान देना चाहिए कि ये कोई पहला मामला नहीं है. मीरा भी श्रीकृष्ण को अपना पति, अपना सखा मानती थीं. शबरी ने श्रीराम को पुत्रवत ही बेर खिलाए थे. शिवजी को एक भक्त बालक तो अपना मामा मान बैठा था. पुराण कथाएं और लोक किवदंतियां ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी हैं, लेकिन उनमें और इस दीवा में एक फर्क जरूर है.

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