
क्या मंगल से पहले गहरे समुद्र में बसने लगेगा इंसान, भारत बना रहा अंडरवॉटर लैब, क्या-क्या होगा यहां?
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देश के वैज्ञानिक अगले दो दशकों के भीतर हिंद महासागर के भीतर दुनिया की सबसे गहरी प्रयोगशाला बना सकते हैं. यहां वे कई तरह के प्रयोग करते हुए ये भी देखेंगे कि क्या समुद्र के भीतर भी इंसानी बस्ती बसाई जा सकती है! लंबे समय ये साइंटिस्ट स्पेस में कॉलोनी बनाने पर जोर दे रहे हैं, लेकिन धरती पर मौजूद समुद्र से बचते रहे.
मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियां बसाने पर अमेरिका समेत दुनिया के कई देश काम कर रहे हैं. इसपर टाइम-लाइन तक बन चुकी कि कितने सालों में दूसरे ग्रहों पर बसाहट हो जाएगी, वहीं समुद्र अब तक रहस्यमयी है, जबकि वो स्पेस की तुलना में काफी करीब है. लेकिन अब इसपर भी काम शुरू हो चुका.
भारत में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी गहरे समुद्र में लैब बनाने जा रही है. यहां तमाम तरह के प्रयोग होंगे, और समुद्र में रहते जीवों को देखा-समझा जाएगा. इससे उम्मीद बढ़ी है कि आने वाले समय में इंसानों को कॉलोनी बनाने के लिए दूसरे ग्रहों तक नहीं जाना पड़ेगा.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियन टैक्नॉलॉजी इसपर काम करने जा रहा है. इसके तहत पहले चरण में लगभग पांच सौ मीटर की गहराई पर एक स्टेशन बनाया जाएगा, जहां तीन वैज्ञानिक एक दिन या उससे अधिक समय तक रहेंगे. लैब में लाइफ सपोर्ट सिस्टम के साथ एक डॉकिंग का सिस्टम भी होगा.
यह स्टेशन अंतरिक्ष में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तरह काम कर सकता है. यहां पारदर्शी दीवारें होंगी, जिससे वैज्ञानिक समुद्री जीवों को देख सकें और रिसर्च कर सकें. साथ ही ऑक्सीजन और तापमान मेंटेन करने की भी व्यवस्था होगी. यहां एक डॉकिंग सिस्टम होगा, ताकि जरूरत पड़ने पर बाहर निकला जा सके. हालांकि समुद्री प्रेशर की वजह से स्टेशन को बनाना और मेंटेन करना काफी चुनौतीभरा हो सकता है.
हाल में वैज्ञानिकों की एक टीम ने फ्रांस के रॉसकॉफ मरीन बायोलॉजिकल स्टेशन को विजिट किया और तकनीकी चीजें देखीं, जो अपने यहां अपनाई जा सकें. यह स्टेशन काफी गहराई पर होगा जो दुनिया में सबसे ज्यादा गहरा समुद्री अनुसंधान केंद्र हो सकता है. उम्मीद है कि अगले ढाई दशक में इसपर काम पूरा हो जाएगा. लेकिन सवाल ये है कि लाखों किलोमीटर दूर स्पेस पर कॉलोनी बसाने पर लंबे समय से काम शुरू हो चुका, लेकिन अपनी ही धरती पर समुद्र में यह आजमाने से वैज्ञानिक क्यों बचते रहे?
ज्यादातर हिस्सा अब तक अनछुआ

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