
कोई अरबपति न हो... क्या जोहरान ममदानी का सपना US को क्यूबा जैसा कमजोर बना देगा?
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न्यूयॉर्क से मेयर पद के उम्मीदवार भारतीय मूल के जोहरान ममदानी विवादों में हैं. कभी वे हाथ से खाना खाने को लेकर ट्रोल होते हैं, तो कभी खुद ही ऊटपटांग बयान दे डालते हैं. ममदानी ने एक इंटरव्यू में कह दिया कि अरबपति गैर-बराबरी बढ़ाते हैं, लिहाजा हमें वे नहीं चाहिए. कुछ दशक पहले ठीक यही बात क्यूबा में कही गई थी और दौलत का समान बंटवारा हो गया.
यह बात बार-बार कही जाती है कि दुनिया में बेहद असमानता है. अमीर और दौलतमंद हो रहे हैं, जबकि गरीब और गरीब हो रहे हैं. बीच-बीच में कई बार डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ वेल्थ जैसा फलसफा भी सुनाई पड़ा. मतलब, अमीरों की दौलत लेकर सबमें बराबरी से बांट दी जाए. साथ ही काम पर सबको बराबर की तनख्वाह मिले. हाल में न्यूयॉर्क से मेयर पद के उम्मीदवार जोहरान ममदानी ने भी अरबपतियों को लेकर नाराजगी दिखाई.
तो क्या पैसों के समान बंटवारे से दुनिया बेहतर हो सकती है? क्या किसी देश ने पहले ऐसी कोशिश की?
पचास का दशक. क्यूबा की राजधानी हवाना में लोग सड़कों पर उतरे हुए थे. नारा लगा रहे थे कि अमीर-गरीब सब बराबर होंगे. तब तक ये देश दो हिस्सों में बंटा हुआ था, एक तरफ थे अमीर और दूसरी तरफ गरीब. एक रोज फिदेल कास्त्रो की लीडरशिप में बगावत हो गई.
कास्त्रो साल 1959 में सत्ता में आए. जैसा कि वादा था, अमल शुरू हो गया. प्रशासन ने बड़ी जमीनें जब्त कर गरीबों में बांट दी. स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, फैक्ट्रिया और होटल, सब सरकार के हाथ में आ गए. कोई सेक्टर निजी नहीं रहा. दौलतमंदों से प्रॉपर्टी लेकर बांटी गई, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. नियम बन गया कि सबको एक बराबर वेतन मिलेगा. डॉक्टर हो, मजदूर या टीचर, सबको बराबर-बराबर तनख्वाह मिलने लगी, चाहे कोई कितना ही पढ़ा-लिखा हो, या कितनी ही चुनौती वाली नौकरी करता हो.
शुरुआत में लगा कि देश बदल रहा है. बराबरी के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन जी-तोड़ मेहनत करके और खूब पढ़े-लिखे लोग भी जब बाकियों जितनी तनख्वाह पाने लगे तो हताशा बढ़ी. मेहनत से बड़ा बिजनेस बना चुके लोग भी अब बाकियों की तरह जिंदगी बिता रहे थे. फिर शुरू हुआ पलायन. अस्सी के दशक में जब निराशा एक्सट्रीम पर थी, लाखों क्यूबन नागरिक अमेरिका की तरफ जाने लगे. ये सामूहिक पलायन छोटी नावों और मछली पकड़ने वाली बोट्स से किया जा रहा था ताकि सरकार को भनक न लगे.

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