
कांग्रेस में अचानक राहुल गांधी से प्रियंका गांधी की तुलना क्यों होने लगी है?
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कांग्रेस पार्टी हमेशा से नेहरू-गांधी परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने में यकीन करती रही है. यही कारण है कि अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के होने के बावजूद पार्टी में चलती गांधी परिवार की है. पर अब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के रूप में 2 शख्सियतें आमने सामने हैं.
भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज एक अहम मोड़ पर खड़ी है. गांधी परिवार की विरासत पर टिकी यह पार्टी चुनावी सफलता के लिए लगातार तरस रही है. ऐसे में नेतृत्व पर सवाल उठने लाजमी हैं. पिछले दो दशकों से कांग्रेस पार्टी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राहुल गांधी के नेतृत्व में है. ऐसे में हर बड़ी असफलता के बाद कार्यकर्ताओं के बीच से आवाज आती है- 'प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ'. लेकिन, अबकी बार जो हो रहा है वो थोड़ा अलग है. राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा की तुलना एक प्रमुख मुद्दा बन गया है.
पिछले दिनों ओडिशा के कांग्रेस विधायक मोहम्मद मोकीम और कांग्रेस पार्टी के ही सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद जैसे नेताओं ने पार्टी के नेतृत्व को लेकर कुछ ऐसा कहा जिसे सामान्य नहीं कहा जा सकता. इन दोनों नेताओं ने वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता की इस तरह तारीफ की जो निश्चित तौर पर राहुल गांधी समर्थकों को नागवार लगी होगी. पर सवाल यह उठता है कि आखिर प्रियंका गांधी के टैलेंट का पार्टी उपयोग क्यों नहीं कर रही है. प्रियंका पार्टी की एकमात्र महासचिव हैं जिनके पास काम का कोई प्रोफाइल नहीं है.
गांधी परिवार की विरासत और राहुल-प्रियंका
कांग्रेस पार्टी की जड़ें गांधी परिवार से इतनी गहराई से जुड़ी हैं कि इसे अक्सर गांधी-नेहरू परिवार की पार्टी कहा जाता है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी जैसे नेताओं ने पार्टी को मजबूत नेतृत्व प्रदान किया. राहुल गांधी, जो 2004 से राजनीति में सक्रिय हैं, को 2017 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन 2019 में लोकसभा चुनाव हार के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन वास्तविक शक्ति गांधी परिवार के हाथों में ही मानी जाती रही है . प्रियंका गांधी, जो लंबे समय तक पर्दे के पीछे से काम करती रहीं, 2019 में औपचारिक रूप से राजनीति में शामिल हुईं. उन्हें पार्टी का ब्रह्मास्त्र कहा जाता था, फिर भी उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं मिला. लोकसभा चुनावों के बाद प्रियंका को उनके रिटायरमेंट के उम्र के कुछ साल पहले लोकसभा में भेजा गया.
2024-25 के चुनावी परिणामों ने राहुल की लीडरशिप पर सवाल उठाए, जिससे प्रियंका की क्षमता की चर्चा तेज हुई. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में कांग्रेस की हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा किया, और कई ने प्रियंका को विकल्प के रूप में देखना शुरू किया.
यह ऐतिहासिक निर्भरता ही एक प्रमुख कारण है. कांग्रेस बिना गांधी परिवार के मजबूत नहीं रह सकती, लेकिन राहुल की बार-बार असफलताओं ने परिवार के भीतर ही विकल्प तलाशने की जरूरत पैदा की. प्रियंका को इंदिरा गांधी की तरह करिश्माई माना जाता है, जो भावनात्मक रूप से लोगों से जुड़ सकती हैं.

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