
कर्नाटक सरकार में कलह, क्या बीजेपी को दिखाई दे रहा है कांग्रेस की आपदा में अवसर?
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कर्नाटक में डिप्टी सीएम डीके शिकुमार और सीएम सिद्धारमैया के बीच कुर्सी के लिए कोल्ड वॉर कोई नई बात नहीं है. ढाई साल पहले जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने वाली थी, तब भी कई दिनों तक सीएम की कुर्सी के लिए कांग्रेस में जद्दोजहद चली थी.
किकर- कर्नाटक में डिप्टी सीएम डीके शिकुमार और सीएम सिद्धारमैया के बीच कोल्ड वॉर कोई नई बात नहीं है. ढाई साल पहले जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने वाली तब भी कई दिनों तक सीएम की कुर्सी के लिए कांग्रेस में जद्दोजहद चली थी.
करीब दो हफ्ते पहले की बात है कि कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही अनबन को नवंबर क्रांति का नाम देते हुए, भाजपा ने एक व्यंग्यात्मक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, डिप्टी सीएम शिवकुमार, सतीश जरकिहोली और जी परमेश्वर को म्यूजिकल चेयर्स खेलते हुए दिखाया गया था.
इस व्यंग्यात्मक वीडियो के साथ भाजपा ने लिखा था कि नवंबर क्रांति की उल्टी गिनती शुरू. भाजपा ने इस वीडियो के ज़रिए कांग्रेस के शासन के भेष में सत्ता संघर्ष पर निशाना साधा था. बीजेपी की यह भविष्यवाणी काफी हद तक सही होती दिख रही है. जिस तरह डीके शिवकुमार के बयान आ रहे हैं उससे यही लगता है कि नवंबर में क्रांति होकर रहेगी. पर असली सवाल यह उठता है कि क्या इस क्रांति को हवा देने का काम बीजेपी भी कर रही है? क्योंकि बीजेपी का इतिहास रहा है कि वो आपदा में अवसर की तलाश में रहती है. बीजेपी के ठीक उलट कांग्रेस का भी इतिहास रहा है कि वह बहुत आसानी से अपनी सत्ता बीजेपी को सौंप देती रही है.
डीके के मेसेज से कांग्रेस में खलबली
ऐसे समय में जब कर्नाटक के नेतृत्व की खींचतान दिल्ली तक पहुंच चुकी है डीके का एक मेसेज बहुत गूढ़ संदेश देता है. शिवकुमार ने कन्नड़ में एक पोस्ट लिखा कि जहां प्रयास है, वहां फल है-जहां भक्ति है वहां भगवान है.हालांकि यह मेसेज उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जयंती के दिन किया था पर इसे सीधे सीधे सरकार के ढाई साल पूरे होने पर कांग्रेस हाईकमान को अपना याद दिलाना समझा गया.
दरअसल ढाई साल पहले कांग्रेस ने जब कर्नाटक में जीत हासिल की उस समय यही समझा गया कि सीएम की कुर्सी डीके को मिलेगी. डीके कांग्रेस के ट्रबल शूटर रहे हैं और कांग्रेस के बचे खुचे नेताओं में शामिल हैं जो साम दाम दंड भेज सभी कला को जानते हैं. जब जब दूसरे राज्यों में कांग्रेस में सकट आता था डीके शिवकुमार ही उद्धारक बनकर उभरते थे. कर्नाटक में उन पर सीबीआई और ईडी का बहुत दबाव पड़ा पर वो कभी टूटे नहीं बल्कि और मजबूत होकर उभरे. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि सीएम पद के वो असली हकदार थे. पर जिस तरह राजस्थान में सचिन पायलट की बलि अशोक गहलोत के चलते ले ली गई वैसा ही कुछ डीके के साथ हुआ. शायद यही कारण था कि कांग्रेस ने ढाई साल के रोटेशन का फॉर्मूला लागू करके उस समय डीके मना लिया था. अब वही वादा जिन्न बनकर कांग्रेस के ऊपर मंडरा रहा है.

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