
इमरजेंसी@50: इंदिरा गांधी के खिलाफ क्या पूरे देश में था आक्रोश? 1977 के चुनाव नतीजों से समझिए
AajTak
इमरजेंसी हटाए जाने के बाद से अब तक यह मिथक प्रचारित किया जाता रहा है कि देश की जनता इतनी नाराज थी कि मार्च, 1977 के आम चुनाव में बैलट पेपर के जरिये कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. क्या पूरे देश में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ माहौल था?
25 जून... यह तारीख जैसे ही करीब आती है, राजनेताओं और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के साथ ही विद्वान 25 जून 1975 से 18 जनवरी 1977 के बीच के 'काले दिनों' को पूरी गंभीरता से याद करने लगते हैं. देश को फिर कभी उन दिनों जैसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा, ऐसी घोषणाओं की बहार आ जाती है. संजय गांधी और उनके समर्थकों की ओर से नसबंदी अभियान के आतंक से लेकर मीडिया पर बंदिश और बंदियों के अधिकार निलंबित किए जाने तक, तमाम विषयों पर बहस का नया दौर शुरू हो जाता है.
इमरजेंसी के अब 50 साल पूरे हो गए हैं. 'वैसे दिन अब फिर नहीं' की घोषणाओं की बाढ़ के बीच भारतीय समाज ने सामूहिक रूप से एक प्रश्न को नजरअंदाज किया है, ईमानदारी से जवाब देने से परहेज किया है. इस सवाल का जवाब देने के लिए आत्मनिरीक्षण की जरूरत होगी. यह सवाल है कि क्या होता अगर इंदिरा गांधी ने देश में लागू इमरजेंसी हटाने का फैसला नहीं लिया होता? इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी हटाने का अचानक ऐलान कर अपने कट्टर आलोचकों को भी आश्चर्यचकित कर दिया था.
देश में इमरजेंसी क्यों लगाई गई? इसे लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन इस बात पर केवल अटकलें ही लगती रही हैं कि इमरजेंसी हटाई क्यों गई? सच्चाई यह है कि इमरजेंसी लागू होने के बाद देश में सबकुछ ट्रैक पर था. ट्रेन टाइम पर चल रही थी, अधिकारी और कर्मचारी समय से पहले दफ्तर पहुंच रहे थे. किसी भी तरह के गंभीर विद्रोह या उग्रवाद के कोई संकेत नहीं थे. लगातार दो साल मॉनसून की अच्छी बारिश के कारण खाद्यान्न की प्रचूर उपलब्धता थी, खाद्य सुरक्षा में सुधार हुआ था और महंगाई दर भी कम हो गई थी. न्यायपालिका में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों की नींद उड़ी हुई थी. स्कूली छात्रों को तब सार्वजनिक अवकाश का आनंद मिला था, जब इमरजेंसी के आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का निधन हुआ.
यह सवाल अनुत्तरित ही रहा कि अगर इमरजेंसी नहीं हटाई गई होती तो क्या 1977 में कोई विनाशकारी घटना घट सकती थी? इस सवाल के जवाब की तलाश से पहले उस मिथक पर चर्चा जरूरी है, जो इमरजेंसी हटाए जाने के बाद से अब तक लगातार प्रचारित किया जाता रहा है. वह मिथक यह है कि इमरजेंसी से भारतीय इतने नाराज थे कि मार्च, 1977 में हुए आम चुनाव में बैलट पेपर पर सामूहिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की और कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. क्या पूरे देश में इंदिरा गांधी और कांग्रेस को हराने के लिए जनता एक टीम की तरह काम कर रही थी? इसे समझने के लिए 1977 चुनाव के आंकड़ों पर गौर करना होगा.
1977 के आम चुनाव
इमरजेंसी हटाए जाने के बाद साल 1977 में हुए पहले आम चुनावों के आंकड़े इस दावे को खारिज करते हैं कि जनता में इतनी नाराजगी थी कि बैलट पेपर के जरिये उसे जाहिर कर इंदिरा गांधी और कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. इस चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि देश के एक बड़े हिस्से ने पूरे दिल से इंदिरा गांधी का समर्थन किया था. नाराजगी जैसी बात पूरे देश में नहीं थी और केवल हिंदी हार्टलैंड के साथ पूर्वी भारत तक ही सीमित थी.

सरकार ने राज्यसभा में बताया कि निजाम के 173 बहुमूल्य गहने 1995 से भारतीय रिजर्व बैंक के वॉल्ट में कड़ी सुरक्षा में रखे गए हैं. संस्कृति मंत्रालय ने इनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और विरासत महत्व को स्वीकार किया है. केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इन गहनों को हैदराबाद में स्थायी सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए स्थानांतरित करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है.

Delhi Weather: दिल्ली में फरवरी की शुरुआत मौसम में बदलाव के साथ होगी. जिसमें हल्की बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं का दौर देखने को मिलेगा. IMD के अनुसार, 31 जनवरी से 3 फरवरी तक न्यूनतम तापमान 6-8 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम तापमान 19-21 डिग्री सेल्सियस के बीच रहेगा. जनवरी में असामान्य बारिश के बाद फरवरी की शुरुआत भी ठंडी और गीली रहने की संभावना है.

जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक पहाड़ों पर भारी बर्फबारी हो रही है और दृश्य अत्यंत सुंदर हैं. इस बर्फबारी के कारण कई पर्यटक इन जगहों की ओर जा रहे हैं. रास्तों पर भारी भीड़ और जाम की स्थिति बन गई है क्योंकि कई मार्ग बंद हो गए हैं. श्रीनगर में सुबह से लगातार बर्फबारी हो रही है जिससे मौसम में बदलाव आया है और तापमान गिरा है. पुलवामा, कुलगाम, शोपियां, गुरेज सहित अन्य क्षेत्र भी इस मौसम से प्रभावित हैं.

अमेरिका का ट्रंप प्रशासन इस महीने ‘ट्रंपआरएक्स’ नाम की एक सरकारी वेबसाइट लॉन्च करने की तैयारी में है, जिसके जरिए मरीज दवा कंपनियों से सीधे रियायती दरों पर दवाएं खरीद सकेंगे. सरकार का दावा है कि इससे लोगों का दवा खर्च कम होगा. हालांकि इस योजना को लेकर डेमोक्रेट सांसदों ने गलत तरीके से दवाएं लिखे जाने, हितों के टकराव और इलाज की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं.

आज सबसे पहले दस्तक देने जा रहे हैं, पंजाब में ध्वस्त होते लॉ एंड ऑर्डर पर, पंजाब में बढ़ते, गैंग्स्टर्स, गैंगवॉर और गन कल्चर पर. जी हां पंजाब में इस वक्त एक दर्जन से ज़्यादा गैंग्स सरेआम कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं, कानून के रखवालों के दफ्तरों के सामने हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं, और तो और बिना डरे, पंजाब पुलिस, पंजाब सरकार को, पंजाब के नेताओं, मंत्रियों, उनके बच्चों, उनके रिश्तेदारों को धमकियां दे रहे हैं. देखें दस्तक.

देहरादून के विकासनगर इलाके में दुकानदार द्वारा दो कश्मीरी भाइयों पर हमला करने का मामला सामने आया है. खरीदारी को लेकर हुए विवाद के बाद दुकानदार ने मारपीट की, जिसमें 17 साल के नाबालिग के सिर में चोट आई. दोनों भाइयों की हालत स्थिर बताई जा रही है. पुलिस ने आरोपी दुकानदार संजय यादव को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच जारी है.

जिस मुद्दे पर नियम बनाकर UGC ने चुप्पी साध ली, राजनीतिक दल सन्नाटे में चले गए, नेताओं ने मौन धारण कर लिया.... रैली, भाषण, संबोधनों और मीडिया बाइट्स में सधे हुए और बंधे हुए शब्द बोले जाने लगे या मुंह पर उंगली रख ली गई. आखिरकार उन UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़े सवाल पूछते हुए इन्हें भेदभावपूर्ण और अस्पष्ट मानते हुए इन नियमों पर अस्थाई रोक लगा दी. आज हमारा सवाल ये है कि क्या इन नियमों में जो बात सुप्रीम कोर्ट को नजर आई... क्या वो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को दिखाई नहीं दी?






