
अमित शाह ने नाम अंग्रेजी का लिया है, लेकिन टारगेट तमिलनाडु चुनाव है
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अमित शाह ने अंग्रेजी का विरोध करते हुए भारतीय भाषाओं की वकालत की है. नई शिक्षा नीति में तीन भाषाएं अनिवार्य करने पर तमिलनाडु सरकार ने कड़ा विरोध जताया था. अमित शाह ने अंग्रेजी का विरोध कर हिंदी विरोधियों को एक साथ कठघड़े में खड़ा कर दिया है.
देश में चल रहे भाषा विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री अमित शाह का एक नया राजनीतिक बयान आया है. अमित शाह ने बड़ी ही खूबसूरती से इस बार सीधे सीधे अंग्रेजी भाषा को ही टार्गेट किया है. अमित शाह ने एक बार में ही कई निशाने भेद डाले हैं.
अंग्रेजी पर आई अमित शाह की राय में निशाने पर वे सभी अंग्रेजी भाषी हैं, जो किसी न किसी रूप में हिंदी विरोधी भी माने जाते हैं. अमित शाह ने पहले जब भी हिंदी की बात की है, विवाद खड़ा हो जाता है, और लड़ाई राजनीतिक हो जाती है. भाषा के साथ साथ क्षेत्रीय राजनीति भी एकजुट हो जाती है.
संसद में बहस के दौरान भी नेताओं को भाषा के नाम भिडे़ देखा गया है. ऐसा लगता है जैसे एक पूरा इलाका हिंदी के खिलाफ लामबंद हो गया हो. ऐसा लगता है, जैसे देश अचानक उत्तर और दक्षिण में बंट गया हो. एक तरफ हिंदी वाले, और दूसरी तरफ हिंदी विरोधी.
सवाल खड़ा हो जाता है, सवाल पूछने पर भी बिल्कुल नई बहस शुरू हो जाती है. प्रश्न हिंदी में पूछा गया तो जवाब अंग्रेजी में क्यों दिया गया. अंग्रेजी में प्रश्न पूछा गया तो जवाब हिंदी में क्यों दिया गया. एक तरफ हिंदी भाषा के हिमायती खड़े हो जाते हैं, और दूसरी तरफ एंटी-हिंदी कम्युनिटी हाथ मिला लेती है.
हाल फिलहाल ये बवाल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तीन भाषाओं की अनिवार्यता को लेकर हो रहा है. नई शिक्षा नीति में छात्रों के लिए तीन भाषाएं सीखने का प्रावधान किया गया है.अंग्रेजी, हिंदी और एक स्थानीय भाषा. और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर विरोध की आवाज उठ रही है, दक्षिण भारत से. तमिलनाडु से. सत्ताधारी डीएमके के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन राज्य की सिर्फ दो-भाषाएं सिखाये जाने की अनिवार्यता पर अड़े हुए हैं.
पहले भी अमित शाह के बयान का दक्षिण के नेताओं ने ये कहते हुए विरोध किया है कि हिंदी जबरन थोपी जा रही है. यही वजह है कि अमित शाह ने अब सिर्फ हिंदी की बात करने के बजाय सभी भारतीय भाषाओं की बात की है, और विरोध सिर्फ अंग्रेजी का किया है.

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