
अंग्रेजों ने खामोश कर दी घुंघरुओं की झनकार... तहजीब सिखाने वाली तवायफों को सेक्स वर्कर में बदल दिया
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तवायफों को एक समय संगीत और नृत्य का उस्ताद माना जाता था, और उनके कोठे युवा राजकुमारों और रईसों के लिए अदब और तहजीब सीखने के केंद्र थे. लेकिन मुगलों के साथ बंगाल, पंजाब और अवध की रियासतों के पतन के साथ ही कोठों की रौनक भी समाप्त होने लगी.
जद्दनबाई अपनी लहराती अनारकली पोशाक में इलाहाबाद के अपने कोठे पर एक मोटे कालीन पर बैठी थीं. उनके चारों ओर दीपक टिमटिमा रहे थे और साजिंदों (संगीत वाले) ने धीरे-धीरे गीत-संगीत शुरू किया. तभी अपनी सुरमई आवाज में उन्होंने ठुमरी शुरू की और पूरी महफिल में छा गईं. जद्दनबाई की कला ने ऐसा जादू बिखेरा कि श्रोताओं में बैठे एक युवक, जिसकी लंदन जाने की योजना थी, ने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा.
जद्दनबाई का मुस्लिम होना ही एकमात्र समस्या नहीं थी, वह एक तवायफ भी थीं. लेकिन उस युवा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. उसने इस्लाम अपना लिया, जद्दनबाई से शादी की और वहीं रह गया. और इस तरह लंदन, इलाहाबाद के एक कोठे से हार गया. वह युवा थे मोहनचंद उत्तमचंद (मोहन बाबू) त्यागी, जो एक रईस मोहयाल हिंदू ब्राह्मण परिवार से आते थे. इस्लाम अपनाने के बाद उन्हें अब्दुल रशीद के नाम से जाना गया. यह 20वीं सदी की शुरुआत थी. तवायफों ने अपना पूर्व गौरव और वैभव खो दिया था, लेकिन उनके कोठे अब भी संगीत से गूंजते थे.
अंग्रेजों की विक्टोरियन नासमझी अभी तक संस्कृति के गलियारों को पूरी तरह से नष्ट करने में कामयाब नहीं हुई थी. जद्दनबाई 1892 में एक कोठे में तवायफ के घर पैदा हुई थीं. हिंदी फिल्म उद्योग की पहली महिला संगीतकार और फिल्म निर्माता बनकर वह इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गईं. जद्दनबाई ने हिंदी सिनेमा को अपनी बेटी- नरगिस - के रूप में एक उपहार भी दिया, जिन्हें अब तक की सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है. जद्दनबाई के परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी तवायफ संस्कृति के सुनहरे दिनों और उसकी ढलान को दर्शाती है.
अदब और तहजीब सीखने के केंद्र होते थे कोठे
तवायफों को एक समय संगीत और नृत्य का उस्ताद माना जाता था, और उनके कोठे युवा राजकुमारों और रईसों के लिए अदब और तहजीब सीखने के केंद्र थे. लेकिन मुगलों के साथ बंगाल, पंजाब और अवध की रियासतों के पतन के साथ ही कोठों की रौनक भी समाप्त होने लगी. अंग्रेज सुसंस्कृत तवायफों पर नाराज थे और उन्हें 'नाचने वाली' (Nautch Girls) कहकर खारिज कर देते थे. हतोत्साहित भारतीय इतने लचीले थे कि उन्हें कोठों में सिर्फ अय्याशी ही दिखती थी. फिर पंजाब में सुधारवादी आंदोलन ने तवायफ संस्कृति को जोरदार झटका दिया.

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