
संघ के 100 साल: संघ के लिए सबसे मुश्किल तमिलनाडु में RSS यात्रा की कहानी
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तमिलनाडु में संघ के विस्तार की जिम्मेदारी नागपुर के एक दुबले-पतले युवा दादाराव परमार्थ को दी गई थी. डॉ. हेडगेवार ने उन्हें खर्चे के लिए 20 रुपये दिए थे. वह समुद्र तट पर सोते थे, मंदिरों में भोजन करते थे, स्थानीय भाषा का ज्ञान न होने के बावजूद उन्होंने कई महीनों तक संघर्ष किया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
अक्टूबर 2025 में कर्नाटक के बागलकोट में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा, “प्रियांक खरगे ने पत्र लिखकर कहा है कि आरएसएस की गतिविधियां सरकारी जमीन पर संचालित की जा रही हैं और उन्होंने तमिलनाडु की तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की है. मैंने मुख्य सचिव को इस संबंध में तमिलनाडु द्वारा उठाए गए कदमों की जांच करने को कहा है.” सोचिए संघ विरोध के नाम पर विपक्षियो के बीच ‘तमिलनाडु मॉडल’ की मिसाल दी जाती है. बावजूद इसके 2025 में ही 2 मार्च को कन्याकुमारी में रानी अहिल्या बाई होलकर की 300वीं जयंती के उपलक्ष में संघ ने ‘कर्मा योगिनी समागम’ कार्यक्रम आयोजित किया तो उसमें 60 हजार महिलाओं ने भाग लिया.
इसका मतलब साफ है कि संघ अब तमिलनाडु में भी एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो गया है. लेकिन ये इतना आसान नहीं था, शुरूआत के दो संघ प्रचारकों ने अपना खून-पसीना, दिन-रात इस लक्ष्य को पाने के लिए एक कर दिया, जीवन तमिलनाडु को ही समर्पित कर दिया और उनमें से एक ने तो अंतिम सांस भी तमिलनाडु में ली और जाने से पहले देह भी दान कर गए थे.
प्रथम प्रचारक दादाराव समुद्र तट पर सोते थे, मंदिरों में भोजन करते थे
संघ की शुरुआत तमिलनाडु में 1939 में हुई थी, जब डॉ. हेडगेवार ने नागपुर से एक दुबले-पतले, युवा दादाराव परमार्थ (1904-1963) को यहाँ भेजा था. वे डॉ. हेडगेवार द्वारा दिए गए तत्कालीन एक जाने-माने वकील के नाम एक पत्र और शुरुआती दिनों के खर्चे के लिए 20 रुपये लेकर यहां आए थे. उनसे अपेक्षा की गई थी कि वे शाखा की शुरुआत करें, संबंध स्थापित करें और संघ की स्थापना करें, साथ ही अपनी दैनिक आजीविका का भी ध्यान रखें. वे समुद्र तट पर सोते थे, मंदिरों में भोजन करते थे, स्थानीय भाषा का ज्ञान न होने के बावजूद, उन्होंने कई महीनों तक संघर्ष किया.
दादाराव परमार्थ यानी गोविंद सीताराम परमार्थ नागपुर के रहने वाले थे. 10वीं की परीक्षा की उत्तरपुस्तिका में उन्होंने जमकर अंग्रेजों के खिलाफ भड़ास निकाली, अध्यापकों ने उन्हें फेल कर दिया, सो पढ़ाई छोड़कर डॉ हेडगेवार से जुड़ गए और स्वयंसेवक बन गए थे. 1930 के जंगल सत्याग्रह में डॉ हेडगेवार के साथ गए और जेल भी गए, बाद में बीमार पड़े तो जेल में डॉ हेडगेवार ने ही उनकी देखभाल की थी. उनके नाम तमिलनाडु के अलावा एक और बड़ी उपलब्धि है, उत्तर पूर्व में संघ का कार्य विस्तार करने वाले वो पहले प्रचारक थे. तमिलनाडु से लौटने के बाद 1946 में उनको आसाम भेज दिया गया था. जब 48 में संघ पर प्रतिबंध लगा तो दादाराव अरविंदो आश्रम पांडिचेरी में और ऋषिकेश में आध्यात्म साधना में लीन रहे. आध्यात्म की गोद में जाने के बाद उनके लौटने का ही मन नहीं था, बड़ी मुश्किल से अप्पाजी जोशी उन्हें समझाकर वापस लाए थे.
बहुत दिनों बाद उनकी एक परिवार से दोस्ती हुई तो उसमें भी एक संयोग था. हुआ यूं कि एक लड़का साइकिल चलाते समय संतुलन खो बैठा और दादाराव उस पर गिर पड़े. दादाराव घायल लड़के को अपने घर ले गए और यहीं से उनकी पहली दोस्ती की शुरुआत हुई. कुछ दिनों तक लड़के के घर जाकर उसका हालचाल पूछते और उसके दोस्तों से मिलते. उस लड़के व उसके कुछ दोस्तों को लेकर ही दादाराव ने अपनी पहली शाखा तमिलनाडु में शुरू की. आज के चेन्नई के रॉयपेट्टा में स्थित भगवान गोविंद दास के बंगले के खुले मैदान में ये शाखा शुरू की गई थी. धीरे धीरे काम बढ़ने लगा, लेकिन जितना बाकी सभी राज्यों में गति तेज थी, वैसी तमिलनाडु में नहीं थी, दादाराव संघ के पहले चार प्रचारको में से एक थे. डॉक्टर हेडगेवार के बाद गुरु गोलवलकर को भी लगा होगा कि कई साल देने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं तो उन्होंने ऐसे स्वयंसेवक की तलाश शुरू कर दी, जो तमिलनाडु के अलावा कहीं और की सोचे ही नहीं. मन में बस एक लक्ष्य हो तमिलनाडु में संघ का विस्तार करना है.

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