
संघ के 100 साल: 12वीं पास छात्र ने दिल्ली में रखी RSS की नींव, असम में भी खोली पहली शाखा
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डॉ हेडगेवार ने 1936 में 12वीं पास वसंतराव ओक को दिल्ली में काम करने के लिए भेजा. दिल्ली में उनके रहने की व्यवस्था हिन्दू महासभा भवन में की गई थी. यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का प्रचार किया. वसंतराव के परिश्रम से इस पूरे क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
जब कश्मीर के राजा हरिसिंह को भारत विलय के लिए तैयार करने में आजाद भारत की पहली सरकार अक्तूबर 1947 तक भी सफल नहीं हो पाई, तब सरदार पटेल ने पंडित नेहरू से सलाह कर तत्कालीन संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर को श्रीनगर जाकर राजा हरिसिंह को मिलने को कहा. उन्हें भरोसा था कि गुरु गोलवलकर इस असम्भव से काम को कर सकते हैं, राजा हरि सिंह उनका काफी सम्मान करते हैं, जबकि पंडित नेहरू को पसंद नहीं करते हैं. ‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’ (सुरुचि प्रकाशन) के वोल्यूम 4 से जानकारी मिलती है कि 17 अक्तूबर 1947 को गुरु गोलवलकर अकेले श्रीनगर नहीं गए, बल्कि उनके साथ कुछ-कुछ प्रचारक/अधिकारी माधवराव मुले, आभाजी थाटे, वसंत राव ओक और बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह भी थे. 18 की सुबह राजा हरि सिंह से उनकी मुलाकात हुई.
इन सभी नामों में आपको एक नाम मिलेगा वसंत राव ओक का, और यही नाम आपको गोवा की आजादी के आंदोलन में गोली खाने वाले आंदोलनकारियों की सूची में भी मिलता है और 1966 में दिल्ली में हुए संसद घेराव वाले गोरक्षा आंदोलन में भी. जब बाबरी मस्जिद के ढांचे को टूटने के बाद माहौल खराब हुआ तो दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों के बीच संघ की भूमिका रखने वाले भी यही थे.
ऐसे ही नहीं उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहा जाता है. चूंकि संघ की शुरूआत नागपुर से हुई तो ज्यादातर शुरूआती संघ के प्रचारक नागपुर या विदर्भ क्षेत्र के ही थे. 13 मई 1914 को उनका जन्म वर्धा (महाराष्ट्र) के नाचणगांव में हुआ था. उनके भाई मनोहर राव तक नागपुर में रहते थे, ऐसे में अपनी आगे की पढ़ाई के लिए वे भी भाई के पास नागपुर आ गए. उन दिनों बाबा साहब आप्टे गरीब विद्यार्थियों को कौशल प्रशिक्षण के लिए टाइपिंग केन्द्र चलाते थे. जब वसंत राव यहां आने लगे तो संघ के लोगों से भी परिचय बढ़ने लगा. धीरे धीरे ड़ॉ हेडगेवार से भी मिलने लगे तो उनके प्रशंसक बन गए.
उन दिनों डॉ हेडगेवार विद्यार्थियों को दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों जैसे काशी, कलकत्ता, प्रयाग, लखनऊ आदि में पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे. इसमें उनके रुकने, एडमीशन, शुल्क आदि में भी जितना सम्भव हो सहायता करते थे. लेकिन पढ़ाई के साथ साथ उनको वहां संघ के कार्य के विस्तार के लिए काम करना होता था. सभी वही स्वयंसेवक थे, जो संघ के लिए अपना जीवन देना चाहते थे. ऐसे में उन सभी को भी नहीं पता था कि एक दिन जब इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें पहली शाखा लगाने वाले के तौर पर उनका नाम भी दर्ज हो जाएगा.
ऐसे ही विद्यार्थियों में भाऊराव देवरस भी थे, जो पहले लखनऊ फिर काशी पढ़ने भेजे गए थे. ऐसे में जिस क्षेत्र या शहर में पहले कभी गए ना हों, जहां के लोग परिचित ना हों, कभी कभी तो भाषा भी अलग होती थी, वहां जाकर बिना पैसे (या बहुत कम पैसे) के एक नया संगठन खड़ा करना, अपनी पढ़ाई करना और फिर अपने खर्च भी निकालना, आसान काम तो था नहीं. और यही बात डॉ हेडगेवार कहते थे और वही आज संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, कि संघ कुछ देता नहीं है बल्कि जो कुछ आपके पास है वो भी ले लेता है.
डॉ. हेडगेवार का आशीर्वाद लेकर वसंत राव 1936 में कक्षा 12 उत्तीर्ण कर शाखा खोलने के लिए दिल्ली आ गए. उनके रहने की व्यवस्था ‘हिन्दू महासभा भवन’ में की गई थी. संघ जब दिल्ली में था ही नहीं, तो कार्यालय कहां से होता. शायद ही किसी और प्रचारक को उस वक्त हिंदू महासभा का कार्यालय और किसी शहर में मिला होगा, ना जाने कितने प्रचारकों ने समुद्र तट, रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर अपनी शुरूआती रातें काटी हैं. यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का प्रचार किया. आज का दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, अलवर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस समय दिल्ली प्रांत में ही था. वसंतराव के परिश्रम से क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया. दिल्ली आते ही डॉ हेडगेवार हो गए नाराज

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