
संघ के 100 साल: जब पांचजन्य के सम्पादक निकल पड़े ज्ञान की खोज में, 56 देशों का किया दौरा
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तिलक सिंह परमार ने 4 वर्षों तक 'पांचजन्य' का संपादन किया. लेकिन उनका फोकस अध्यात्म और विरक्ति की ओर बढ़ने लगा. वे संपादक पद से त्यागपत्र देकर वे संन्यास की ओर प्रस्थान कर गए. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
तिलक सिंह परमार के पिताजी गांधीजी के समर्थक थे लेकिन लोकमान्य तिलक की पूजा करते थे. सो अपने इकलौते बेटे का नाम रख दिया तिलक, पूरा नाम हुआ तिलक सिंह परमार. जिस एटा जिले में लोग किसी का सर काटकर रिक्शे में रखकर थाने पहुंच जाते हैं, उसी जिले में इनका जन्म आठ सितंबर 1929 को ऋषि पंचमी के दिन हुआ था. हालांकि अब उनका नगर कासगंज जो पहले उत्तर प्रदेश के एटा जिले का हिस्सा था. अब कासगंज जनपद के नाम से जाना जाता है. पिता का नाम ठाकुर शालिग्राम सिंह परमार एवं माता का नाम गंगा देवी था.
असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी से तमाम लोग गांधीजी से नाराज हो गए थे. उनमें से बहुतों ने बाद में संघ का भी दामन थाम लिया था. छात्र जीवन के दौरान ही तिलक सिंह के सम्पर्क संघ से हो गए थे. लेकिन उनके कांग्रेसी पिता को नहीं भाता था. कई बार गुस्सा भी हुए. इनकी आरंभिक शिक्षा कासगंज नगर में हुई थी. यहीं वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए, उनके अगाध ज्ञान एवं हिंदुत्व के प्रति निष्ठा की चर्चा संघ के स्थानीय पदधिकारियों में होने लगी थी. वहां से आगे की पढ़ाई के लिए आगरा आए और दर्शन से एमए करने लगे. गांधीजी की हत्या के चलते उनकी भी गिरफ्तारी हुई, उनको एटा जेल में रखा गया, 6 महीने बाद ही रिहा हो पाए थे. तिलक की पांचजन्य यात्रा
धीरे धीरे उनकी चर्चा संघ के प्रचारकों से होती हुए प्रांतीय नेतृत्व तक पहुंचने लगी थी. उस वक्त वो ‘पांचजन्य’ का सम्पादक ढूंढ रहे थे, जो लखनऊ में रहकर कम साधनों में ही अखबार निकाल सके. उन्हें 1954 में उस पाक्षिक अखबार का सम्पादक बना दिया गया. जो वेतन मिलता था, उससे बमुश्किल रहना, खाना हो पाता था, लेकिन जिम्मेदारी इतनी होती थी कि कहीं से प्रकाशित होने को खबरें या अन्य लेख ना आएं तो उन्हें खुद लिखकर पेज भरने होते थे. ऐसे में वे कई अलग अलग छद्मनामों से पांचजन्य में लिखते थे. लेकिन ऐसा एक दिन भी नहीं गया कि अखबार प्रकाशन के लिए जाने में देरी हुई हो. हालांकि इससे एक लाभ तो हुआ था, हिंदुत्व से जुड़े अलग अलग विषयों पर उनकी पकड़ मजबूत होती जा रही थी. 1954 से 1958 तक 'पांचजन्य' का संपादन दायित्व संभालने के समय से ही उनके चिंतन की धारा अध्यात्म व विरक्ति के पथ पर अग्रसर होने लगी. चार साल उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन उनको मन भटक रहा था. स्वामी विवेकानंद से वो बहुत ही ज्यादा प्रभावित थे. उनका मन मोह माया के फेर से बाहर आने लगा. फलतः संपादक पद से त्यागपत्र देकर वे संन्यास की ओर अग्रसर हुए और सत्य की खोज में भटकने लगे. लेकिन उससे पहले उन्होंने माता पिता के बारे में भी सोचा कि उनको कम से कम एक तय राशि तो हर महीने मिलती ही रहे.
इतने दिनो में उन्होंने बच्चो के लिए कई किताबें लिख डालीं, उनके कॉपीराइट एक प्रकाशक को दिए और तय हुआ कि समय पर एक तय राशि उनके माता पिता को मिलती रहेगी. ऐसे में माता पिता ने उनको संन्यास की अनुमति दे दी लेकिन एक शर्त पिता ने ये ऱखी कि अक्सर साधु संन्यासी बनने के बाद लोग अपना नाम बदल लेते हैं, लेकिन वायदा करो कि तुम नहीं बदलोगे. उन्हें तिलक नाम से प्यार था और उसका सम्मान भी. हालांकि उनके पिता को ये नहीं पता था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार भी लोकमान्य तिलक का इतना ही सम्मान करते थे. जो भी हो स्व की खोज के लिए पिता की शर्त को तिलक सिंह ने मान लिया और कभी अपना नाम नहीं बदला.
RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी
इस खोज को विराम मिला नर्मदा तट स्थित चिचोरखेड़ा जो जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हैं. यहां उनके गुरु बने सिद्धगुरू बजरंग दास. उनको गुरु क्यों बनाया होगा, आप इस एक घटना से बखूबी समझ सकते हैं. एक बार तिलक सिंह परमार ने बाबा बजरंग दास से कहा कि मुझे आपकी जीवनी लिखनी है, आप अतीत की वो घटनाएं बताएं, जो आप के लिए इतनी जरूरी थीं कि उन्हें आप भूल ही नहीं सकते. बाबा मुस्कराए और बोले, “ना अतीत का कुछ याद, नाम भविष्य के बारे में कोई चिंता, ये सब होता तो संन्यासी होता. जो तुमने देखा है, जो तुम जानते हो वो लिखो.” ये उत्तर किसी भी गंभीर व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा संदेश था कि संन्यासी को व्यक्तिगत लाभ-हानि, यश-अपयश इन सबसे ऊपर उठ जाना चाहिए.

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