
बीएमसी चुनाव तय करेंगे महाराष्ट्र के इन 5 बड़े मुद्दों का भविष्य
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बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 15 जनवरी 2026 को होने वाले हैं, जो महाराष्ट्र की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित होने वाला है. इस बार इन चुनावों में कई मुद्दे अहम हैं जो भविष्य में महाराष्ट्र की राजनीति को निर्धारित करने वाले पिलर साबित होंगे.
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव इस बार राज्य की राजनीति को इतने हिचकोले दे रहा है, जितना कभी विधानसभा चुनावों में भी नहीं दिया होगा. इन चुनावों में महाराष्ट्र की राजनीति का जो चेहरा सामने आया है उससे तो यही लगता है कि राज्य में राजनीतिक नैतिकता नाम की कोई चीज ही नहीं बची. कोई गठबंधन हो या कोई पार्टी, इन चुनावों में अनैतिक तौर-तरीकों से बची नहीं है. गठबंधनों की ऐसी शृंखला देखने को मिली है जिस पर यकीन करना मुश्किल हो जा रहा है.
227 वार्डों वाली यह भारत की सबसे अमीर और प्रभावशाली नगरपालिका है, जिसका बजट 74,000 करोड़ रुपये से अधिक है. जाहिर है कि इस पर अधिकार के लिए सब कुछ जायज है कि तर्ज पर चुनाव लड़ा जा रहा है. ऐसा समझा जा रहा है कि बीएमसी के इन चुनावों में कई ऐसी चीजें तय होनी हैं जो महाराष्ट्र के भविष्य की राजनीति तय करेंगी.
1-मराठी अस्मिता के मुद्दे में कितना दम?
मराठी अस्मिता बीएमसी चुनाव का सबसे जोरदार मुद्दा है, अगर ये मुद्दा चल गया तो बीएमसी चुनावों की फिजा कुछ अलग होगी. उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (एमएनएस) ने 20 साल बाद एकजुट होकर मराठी माणूस की रक्षा का नारा दिया है. ठाकरे बंधुओं के द्वारा इसे मुंबई की आखिरी जंग बताया जा रहा है.
ठाकरे बंधुओं ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि ये लोग मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर रहे हैं. बीजेपी पर हिंदी थोपने और गैर-मराठी हितों को बढ़ावा देने का भी आरोप है. महायुति ने भी मेनिफेस्टो में मराठी माणूस को वापस लाने, सस्ते घर और संस्कृति मजबूत करने का वादा किया है. लेकिन युवा वोटर इस मुद्दे को नजरअंदाज करते हैं या इसे सपोर्ट करते हैं , ये देखने वाली बात होगी. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जेन-जेड वोटर पॉटहोल, वेस्ट मैनेजमेंट, एयर क्वालिटी और सिविक इश्यूज पर फोकस कर रहे हैं, भाषाई राजनीति को पुरानी मानते हैं.
मराठी वोटर (30-35%) महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उत्तर भारतीय (25-30%), गुजराती और अन्य समुदायों का विरोध बढ़ सकता है. राज ठाकरे के पुराने बयान और हिंदी थोपने पर किक वाली धमकी से गैर-मराठी वोटर अलग हो सकते हैं. मुद्दे में दम है क्योंकि यह ठाकरे बंधुओं की पारंपरिक ताकत है, लेकिन 2026 में विकास और युवा वोटरों के कारण इसका प्रभाव कम हो सकता है.

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