
राजनीतिक अस्थिरता और जन आंदोलनों का इतिहास... नेपाल में फिर भी क्यों नहीं हुआ सैन्य तख्तापलट?
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नेपाल की छवि एक शांत देश की है, जिसने सीधे पर किसी भी देश से जंग नहीं लड़ी. कम आबादी वाले देश में सेना के पास भी सीमित संसाधन हैं और ऐसे में वहां किसी भी तरह के सैन्य तख्तापलट की संभावना नहीं है. सेना की छवि और सियासी नियंत्रण की वजह से अब तक ऐसी नौबत नहीं आई है.
नेपाल में Gen-Z आंदोलन का सबसे बड़ा हासिल प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का इस्तीफा है. इसके बाद देश में अंतिरम सरकार के गठन की कोशिशें तेज हो गई हैं. अभी नेपाल की बागडोर सेना के हाथों में है. लेकिन युवाओं की मांग है कि जल्द से जल्द नागरिक-सैन्य सरकार का गठन किया जाए और फिर एक साल के भीतर चुनाव कराए जाएं, ताकि नई सरकार बने. नेपाल की सेना का रुख अब तक आंदोलन को शांत करने और अंतरिम सरकार में भूमिका निभाने तक ही सीमित रहा है. सेना की तरफ से किसी तरह के सैन्य तख्तापलट की कोशिश नहीं की गई है.
शांति स्थापित करने पर फोकस
नेपाल के पूर्व पीएम ओली ने जब हिंसा के बीच सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल को बुलाकर स्थिति पर काबू पाने को कहा, तब उन्होंने भी ओली को इस्तीफा देने की सलाह दी. इससे साफ है कि सेना जनता के हितों की पक्षधर बनकर खड़ी है. पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों में सैन्य तख्तापलट का इतिहास रहा है. लेकिन नेपाल की सेना सत्ता हथियाने की बजाय आंदोलनकारियों को शांत करने में जुटी रही. फिलहाल संसद से लेकर राष्ट्रपति आवास और प्रमुख सरकारी इमारतों की सुरक्षा सेना के हाथों में है. इसके अलावा ओली से लेकर कई बड़े नेता सेना के संरक्षण में पनाह लिए हुए हैं.
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नेपाल की सेना ने ऐतिहासिक रूप से सैन्य तख्तापलट से दूरी बनाए रखी है. इसका कारण देश की सामाजिक-राजनीतिक संरचना और सेना की संवैधानिक स्थिति को माना जाता है. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का इतिहास है, बावजूद इसके एक भी बार सैन्य तख्तापलट की नौबत नहीं आई. सेना ने हर बार खुद को सरकार में दखल या सत्ता हथियाने से दूर रखा. नेपाल का संविधान सेना को नागरिक सरकार के अधीन रखता है. अनुच्छेद 267 के तहत, सेना का सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति होता है, जो एक संवैधानिक पद है. सेना को विकास कार्यों, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कामों तक सीमित रखा गया है.
अंतरराष्ट्रीय मिशनों में योगदान

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