
यूपी की शहजादी के लिए मौत नहीं उम्रकैद चाहता था पीड़ित परिवार, वादी ने अबू धाबी की अदालत से की थी ये मांग
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शहजादी का मुकदमा जब अबू धाबी की कोर्ट में चल रहा था, तब खुद फैज ने एक बार अदालत से पूछा था कि क्या शहजादी की सजा को उम्रकैद में तबदील किया जा सकता है? तब अदालत ने कहा था कि अब इसमें काफी देरी हो चुकी है.
Shahzadi Khan Death Sentence in Abu Dhabi: यूपी के बांदा की रहने वाली शहजादी अब इस दुनिया में नहीं है. उसे अबू धाबी की जेल में गोली मारकर सजा-ए-मौत दी गई. इस दौरान पता चला है कि जिस चार महीने के बच्चे की हत्या के इल्जाम में शहजादी को मौत की सजा मिली, उसका परिवार शहजादी की मौत नहीं चाहता था. वो बस शहजादी को उम्रकैद या चंद सालों की कैद दिए जाने के हक में था. लेकिन जब तक उस परिवार ने अपनी ख्वाहिश अदालत के सामने रखी, तब तक देर हो चुकी थी. शहजादी की मौत के परवाने पर अदालत की मुहर लगा चुकी थी. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इस मामले में हुआ क्या था.
25 जनवरी 2025, अबू धाबी अबू धाबी में रहने वाले फैज के पास अबू धाबी की अदालत से एक फोन कॉल आती है. फैज वही शख्स हैं, जिनके चार महीने के बच्चे की हत्या का इल्जाम यूपी की रहने वाली शहजादी पर था. कोर्ट से फोन करने वाला अधिकारी फैज को एक लोकेशन भेजता है और वहां पहुंचने को कहता है. तय वक्त पर फैज उस लोकेशन पर पहुंच जाते हैं. वहां पहली बार अबू धाबी की हायर अथॉरिटी के अधिकारी फैज को बताते हैं कि शहजादी को सजा-ए-मौत देने के लिए 15 फरवरी की सुबह साढ़े पांच बजे का वक्त मुकर्रर किया गया है.
सजा-ए-मौत के वक्त जेल नहीं गए थे फैज साथ ही अधिकारी फैज से ये भी कहते हैं कि अगर वो चाहें तो शहजादी की सजा-ए-मौत को अपनी आंखों से देखने के लिए 15 फरवरी की सुबह साढ़े पांच बजे वो जेल पहुंच जाएं. हालांकि फैज को ये भी कहा गया था कि फांसी से पहले उन्हें एक और बार फोन पर जानकारी दी जाएगी. लेकिन फैज अपनी आंखो के सामने किसी को मरता नहीं देख सकते थे, इसलिए वो 15 फरवरी की सुबह जेल नहीं पहुंचे. हालांकि 25 जनवरी के बाद उन्हें दोबारा कभी कोई कॉल भी नहीं आया था.
फैज के परिवार को नहीं मिली थी खबर अबू धाबी में शनिवार और रविवार की छुट्टी होती है. इन दो दिनों में सभी सरकारी दफ्तर बंद रहते हैं. सूत्रों के मुताबिक 17 फरवरी की शाम तक फैज को अबू धाबी की अथॉरिटी के जरिए इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी कि शहजादी को फांसी दे दी गई है. हालांकि कानूनन शहजादी की फांसी की खबर फैज और उनके परिवार को ऑफिशियली देना जरूरी था.
उम्रकैद दिए जाने के हक में था पीड़ित परिवार सूत्रों के मुताबिक, शहजादी का मुकदमा जब अबू धाबी की कोर्ट में चल रहा था, तब खुद फैज ने एक बार अदालत से पूछा था कि क्या शहजादी की सजा को उम्रकैद में तबदील किया जा सकता है? तब अदालत ने कहा था कि अब इसमें काफी देरी हो चुकी है. सूत्रों के मुताबिक फैज और उसके परिवार के सामने कई बार इस सवाल को रखा गया था कि क्या वो शहजादी के लिए क़िसास की तरफ जाएंगे या लीवर की तरफ?
कोर्ट पर ही छोड़ दिया था सजा का फैसला असल में अरबी में किसास का मतलब बदला होता है और लीवर शब्द किसी को माफ करने या बख्श देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. फैज का परिवार कभी भी किसास यानि बदला लेने के हक में नहीं था. पर सूत्रों के मुताबिक, अबू धाबी में लीवर के लिए जाने का मतलब सीधे सीधे ये था कि शहजादी की सजा को माफ करते हुए उसे रिहा कर दिया जाता. पर फैज का परिवार बेशक बदला नहीं चाहता था लेकिन वो ये भी नहीं चाहता था कि बगैर सजा मिले चंद सालों में ही शहजादी को आजाद कर दिया जाए. इसलिए उन्होंने शहजादी की सजा का फैसला कोर्ट पर ही छोड़ दिया था.

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