
माथे के तिलक पर चावल ही क्यों लगाते हैं, गेहूं-दाल-बाजरा क्यों नहीं? जानें क्या है वजह
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पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक के लिए केवल चावल का उपयोग किया जाता है. दरसअल, सनातन परंपरा में चावल को अक्षत माना गया है. जो कभी नष्ट न हो. यह पवित्रता, समृद्धि और स्थायित्व का प्रतीक है. इसलिए शुभ कार्यों, पूजा-पाठ और त्योहारों में चावल का तिलक लगाने की परंपरा है.
Rice Tilak Significance: भारत में पर्व-त्योहार से लेकर शुभ व मांगलिक कार्यों में अक्षत यानी चावल का तिलक लगाने की परंपरा है. क्या कभी आपने सोचा है कि लोग गेहूं, दाल, बाजरा या किसी दूसरे अनाज का तिलक क्यों नहीं लगाते हैं. रक्षाबंधन, भाई दूज, शादी-विवाह, पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में केवल चावल का तिलक ही माथे पर लगाया जाता है. आइए आज आपको बताते हैं कि सनातन धर्म में अक्षत या चावल को इतना पवित्र और पूजनीय क्यों माना गया है.
शास्त्रों के जानकार कहते हैं कि चावल एकमात्र ऐसा धान है जिसे बिना तोड़े ग्रहण किया जाता है. इसे रोपने के बाद भी नया अंकुर नहीं निकलता है. यानी यह शुद्ध, समृद्ध, पूर्णता और स्थिर ऊर्जा का प्रतीक है. सनातन परंपरा में इसे अक्षत कहा गया है. इसका अर्थ है जो कभी टूटे नहीं और सदा संपूर्ण रहे. यही वजह है कि चावल को न सिर्फ हिंदू बल्कि जैन धर्म में भी बहुत पवित्र माना गया है.
सनातन धर्म में चावल सिर्फ अन्न नहीं है, बल्कि मां लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक भी है. तभी तो शादी के वक्त घर से विदा होते हुए बेटी अपनी पीठ के पीछे चावल फेंकती है. और जब वो ससुराल पहुंचती है तो अपने पैर से चावल से भरे कलश को स्पर्श करके गिराती है ताकि घर की सुख-समृद्धि बनी रहे. इसका अर्थ है कि सकारात्मकता और शुभता का घर में प्रवेश हो रहा है.
माथे पर क्यों तिलक के साथ लगाते हैं चावल? ज्योतिषविदों का कहना है कि माथे पर तिलक के साथ चावल लगाने से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है. माथे पर तिलक के साथ लगा अक्षत जीवन ग्रहों की स्थिति को संतुलित करता है. प्रत्येक ग्रह कुछ विशिष्ट गुण, ऊर्जा और देवताओं से जुड़े होते हैं. इसलिए तिलक पर चावल लगाने से न सिर्फ देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है, बल्कि ग्रह और ऊर्जा भी नियंत्रित रहते हैं.

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