
बॉलीवुड में कम्युनल एंगल पर एआर रहमान बता रहे आधी सच्चाई... 2015 के बाद वाकई खो गया उनका जादुई संगीत!
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हाल ही में एक इंटरव्यू में एआर रहमान ने बॉलीवुड में अपने हालिया काम के लिए नॉन-क्रिएटिव पावर शिफ्ट और सांप्रदायिक कानाफूसी को जिम्मेदार ठहराया. सच तो यह है कि 2015 के बाद की उनकी फ्लॉप फिल्मों ने उनके पतन में योगदान दिया.
एआर रहमान, अमिताभ बच्चन के बाद हिंदी सिनेमा के लिए सबसे अच्छी चीज हैं. एक एक्टर के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे म्यूजिक डायरेक्टर के तौर पर जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत के DNA को ही बदल दिया.
1970 के दशक में बच्चन की तरह, 1992 से 2015 तक, किसी एल्बम पर रहमान का नाम सफलता की गारंटी था. उनका म्यूजिक एक पीढ़ी को परिभाषित करता था, गाने कल्चरल एंथम बन जाते थे और फिल्म को सिर्फ उनकी वजह से सफल होने का मौका मिलता था.
जब रहमान ने हाल ही में खुलासा किया कि पिछले आठ सालों में बॉलीवुड में उनके काम में काफी गिरावट आई है, क्योंकि अब नॉन-क्रिएटिव लोग फैसले कंट्रोल करते हैं, तो यह सिर्फ एक पर्सनल दुख नहीं था, बल्कि यह इंडस्ट्री पर एक आरोप था.
लेकिन यहां एक कड़वी सच्चाई है जिसे कहने की जरूरत है- रहमान भी अपने बॉलीवुड करियर में गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं. तमाशा (2015) के बाद बॉलीवुड में उनका काम चौंकाने वाले रूप से इनकंसिस्टेंट रहा है, और इसमें से ज्यादातर तो बस भुला देने लायक है.
एक स्टार का जन्म रहमान से पहले, हिंदी फिल्म संगीत अनुमानित और कॉपी किया हुआ होता था. अनु मलिक, आनंद मिलिंद, विजू शाह जैसे संगीतकार न सिर्फ दुनिया भर से, बल्कि इलाया राजा जैसे दिग्गजों से भी बेशर्मी से म्यूजिक कॉपी करते थे. बॉलीवुड में विडंबना यह है कि रहमान की कंपोजिशन चुराकर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. 'द जेंटलमैन' के लिए, मलिक ने रहमान के ओरिजिनल तमिल साउंडट्रैक को कॉपी किया और चोरी के आरोपों को यह कहकर खारिज कर दिया- 'क्या दो महान लोग एक जैसा नहीं सोच सकते?'
फिल्म 'रोजा' के साथ भारत का पूरा म्यूजिक लैंडस्केप अचानक बदल गया. अगले दो दशकों तक किसी एल्बम पर रहमान का नाम एक कल्चरल गारंटी था. संगीत हवा में छा जाता था, गाने हर घर, टैक्सी और शादी में लूप पर बजते थे, और फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अपने आप फायदा मिलता था.













