
बिहार की कहानी भले ही गठबंधन-राजनीति की एक और कड़ी लगे, पर असली नाट्य कहीं और है
The Wire
बिहार में एक ऐसा आख्यान गढ़ा जा रहा है जिसमें नाटक का केंद्रीय पात्र मंच पर तो उपस्थित है, पर अपनी ही कहानी कहने में असमर्थ. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के उदय के साथ जो राजनीतिक नाटक सामने आया था, इसी राजनीति का एक प्रारूप था. बिहार में जो घट रहा है, वह उस कथा की पुनरावृत्ति कम और एक नई व्याख्या अधिक प्रतीत होता है.
विश्वासघात और साज़िश की राजनीति कभी एक तयशुदा पटकथा का अनुसरण नहीं करती बल्कि हर क्षण अपनी अलग व्याकरण रचता है- परिस्थितियों, महत्वाकांक्षाओं और सत्ता की विचित्र मनोविज्ञान से निर्मित. बिहार में नीतीश कुमार के इर्द- गिर्द जो कुछ घटित हुआ है, वह मानो इसी प्रकार की एक पाठ्यपुस्तक-सी घटना है- जहां विश्वासघात केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है.
यहां प्रश्न केवल गठबंधनों के बदलने या सत्ता के समीकरणों के पुनर्गठन का नहीं है; यहां एक ऐसी स्थिति गढ़े जाने का प्रश्न है जिसमें जिस व्यक्ति के साथ विश्वासघात हुआ है, उसे उसी विश्वासघात को नाम देने की भाषा से भी वंचित कर दिया गया है.
लोकतांत्रिक राजनीति में किसी शिकायत या आघात को नाम देना स्वयं में एक प्रकार की एजेंसी है. पराजित नेता आरोप लगा सकता है, मित्र से प्रतिद्वंद्वी बने साथी अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकते हैं, और ठगा गया सहयोगी नैतिक क्षति का दावा कर सकता है. ये सब कथन- चाहे वे ईमानदार हों या रणनीतिक- लोकतंत्र के रंगमंच का हिस्सा होते हैं. इन्हीं के बीच नागरिक राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या करता है. कोई बोलता है, कोई बचाव करता है, और इन सबके बीच जनता अपने अर्थ गढ़ती है.
मगर कभी- कभी सत्ता की कोरियोग्राफी इतनी बारीकी से रची जाती है कि यह न्यूनतम अधिकार भी छीन लिया जाता है. नीतीश कुमार के प्रसंग में कुछ वैसा ही प्रतीत होता है. यहां विश्वासघात का शिकार व्यक्ति मौन रहने को विवश दिखता है- शायद प्रत्यक्ष दबाव से नहीं, बल्कि निर्भरता और राजनीतिक अस्तित्व की सूक्ष्म संरचना के कारण.
ऐसे मौन को सहमति समझना भूल होगी. यह साफ़ तौर पर परिस्थितियों द्वारा थोपा गया एक अनुबंध सा लगता है- प्रासंगिक बने रहने की अलिखित शर्त.
बिहार की कहानी सतह पर भले ही भारत की परिचित गठबंधन- राजनीति की एक और कड़ी लगे, पर उसका असली नाट्य कहीं और है. यहां एक ऐसा आख्यान गढ़ा जा रहा है जिसमें नाटक का केंद्रीय पात्र मंच पर तो उपस्थित है, पर अपनी ही कहानी कहने में असमर्थ. वह दृश्य में है, पर कथा पर उसका अधिकार नहीं रहा. समकालीन भारतीय राजनीति में यह बिल्कुल अभूतपूर्व भी नहीं है.

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देश में एलपीजी गैस की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के बीच गुरुवार को संसद में जारी बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान ज़ोरदार हंगामा देखने को मिला. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सरकार पर इस मुद्दे पर ग़लत जानकारी देने का आरोप लगाया और इस पर संसद के भीतर विस्तृत चर्चा की मांग की. हालांकि, सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त भंडार हैं.

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