
क्या मनरेगा की ख़ामियों को भर सकेगा वीबी-जी राम जी?
The Wire
मनरेगा के राज्य-स्तरीय तथ्य एक राजनीतिक रूप से असहज स्वरूप दिखाते हैं. यह कार्यक्रम उन इलाकों में सबसे सफल नहीं रहा जहां ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी, बल्कि वहां बेहतर रहा जहां प्रशासनिक ढांचा मज़बूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट थी. केरल और ओडिशा के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा अधिकार से अधिक प्रशासनिक योजना बन गई है, ऐसे में वीबी-जी राम जी को क्या अलग करना होगा?
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) भारत की कल्याणकारी व्यवस्था में एक दुर्लभ पहल के रूप में आई थी. यह कोई अनुदान या विवेकाधीन कार्यक्रम नहीं था, बल्कि काम का एक कानूनी अधिकार था. सैद्धांतिक तौर पर, इसने राज्य-नागरिक संबंधों की बुनियाद को पुनर्परिभाषित कर दिया था. इसके अनुसार, अगर लोग काम की मांग करते थे, तो राज्य उन्हें काम उपलब्ध कराने के लिए बाध्य था. अगर ग्राम पंचायतें योजना बनाती थी, तो प्रशासन उसे संभव बनाता था. इसमें मजदूरी की गारंटी थी, देरी पर दंड का प्रावधान था और जवाबदेही निहित थी.
पर लगभग दो दशक बाद एक कड़वी सच्चाई यह है कि हालिया कानूनी बदलावों से कहीं पहले ग्रामीण भारत के बड़े हिस्सों में मनरेगा एक अधिकार के रूप में काम करना बंद कर चुका था. इसमें जो शेष था, वह एक बजट-सीमित, प्रशासनिक रूप से नियंत्रित और राजनीतिक रूप से अनियमित योजना थी. यह अंतर निर्णायक है. अधिकार सत्ता संबंधों को बदलते हैं, जबकि योजनाएं केवल लाभ वितरित करती हैं.
कैसे एक अधिकार चुपचाप एक योजना में बदल गया
मनरेगा का कमजोर पड़ना किसी एक बड़े नाटकीय नीतिगत बदलाव से नहीं हुआ. यह एक निरंतर प्रक्रिया थी. उदाहरण के तौर पर, काम की मांग दर्ज करने की प्रक्रिया कागजी औपचारिकता बनकर रह गई, न कि लोगों की वास्तविक जरूरतों की अभिव्यक्ति. ऑडिट निष्कर्षों में यह सामने आया कि काम की मांग अक्सर औपचारिक रूप से दर्ज ही नहीं की जाती थी. कई मामलों में आवेदन बाद की तारीख में भरे जाते थे, रसीदें गायब होती थी और रिकॉर्ड अधूरे रहते थे.
इसके चलते ‘अपूर्ण मांग’- यानी काम चाहने वाले परिवारों और वास्तव में प्रदान किए गए रोजगार के बीच के अंतर को प्रमाणित करना लगभग असंभव हो गया. यहां तक कि राजस्थान जैसे सूखा-प्रभावित राज्यों में ग्रामीण संकट के भीषण दौर में भी यह देखने को मिला है. सत्यापन योग्य आंकड़ों के अभाव ने यह कहने की गुंजाइश बनाए रखी कि मनरेगा के तहत काम की मांग कम है.
इसी तरह के बदलाव अन्य क्षेत्रों में भी देखे गए. तयशुदा योजना प्रारूपों ने स्थानीय जरूरतों को पीछे धकेल दिया. मजदूरी में देरी ने लोगों का भरोसा कमजोर किया, और ग्राम पंचायतें ऐसे काम लागू करने लगीं जिन्हें उन्होंने सार्थक रूप से स्वयं नहीं गढ़ा था. धीरे-धीरे रोज़गार का रिश्ता घरों की मांग से हटकर सरकारी घोषणाओं से जुड़ने लगा. यह अधिकार से ‘अपेक्षा’ की ओर एक धीमा, लेकिन गहरा बदलाव था.

महाराष्ट्र में एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति बाधित होने से पीएम पोषण (मिड-डे मील) योजना प्रभावित होने की आशंका जताई गई है. प्राथमिक शिक्षा निदेशालय ने बीपीसीएल और एचपीसीएल से स्वयं सहायता समूहों और केंद्रीय रसोईघरों के लिए सिलेंडरों की प्राथमिक आपूर्ति सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है, ताकि छात्रों के भोजन पर असर न पड़े.

लोकसभा में सपा सांसद धर्मेंद्र यादव के सवाल के जवाब में केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि मणिकर्णिका घाट एएसआई के तहत संरक्षित स्मारक नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि घाट पर चल रहा कार्य घाट की गरिमा को बहाल करने के उद्देश्य से किए जा रहे जीर्णोद्धार और संरक्षण परियोजना का हिस्सा है.

देश में एलपीजी गैस की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के बीच गुरुवार को संसद में जारी बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान ज़ोरदार हंगामा देखने को मिला. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सरकार पर इस मुद्दे पर ग़लत जानकारी देने का आरोप लगाया और इस पर संसद के भीतर विस्तृत चर्चा की मांग की. हालांकि, सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त भंडार हैं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक ने ‘प्रेस नोट 3’ के जरिए भारत के साथ स्थल सीमा साझा करने वाले देशों, मुख्य रूप से चीन पर लगाए गए प्रतिबंधों को वापस लेने का फैसला किया है. यह नियम इन देशों से आने वाले स्वत: निवेश पर रोक लगाता था. विपक्षी दलों ने इस निर्णय को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है.

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