
दहेज हत्या केस में ज़मानत देने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा फटकारे गए जज ने ऐसे 99% मामलों में दी है बेल
The Wire
फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में ज़मानत देने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया की आलोचना की थी. अब एक पड़ताल में सामने आया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच जस्टिस भाटिया की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने दहेज संबंधित हत्या के 510 मामले सुने थे, जिनमें से 508 केस में उन्होंने आरोपी की ज़मानत मंज़ूर की.
नई दिल्ली: बीते फरवरी महीने में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस पंकज भाटिया द्वारा दहेज हत्या से जुड़े मामले में ज़मानत देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए थे. शीर्ष अदालत का कहना था कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति, सजा की गंभीरता, आरोपी और मृतका के रिश्ते, घटना की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था.
अब इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में सामने आया है कि पिछले साल 2025 के आखिर के तीन महीनों में जिस बेंच की अध्यक्षता जस्टिस पंकज भाटिया कर रहे थे, उसने दहेज हत्या के लगभग सभी मामलों में आरोपियों को ज़मानत दी है.
अख़बार के विश्लेषण के अनुसार, तीन महीने- अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने दहेज से संबंधित हत्या के 510 मामलों में से 508 में ज़मानत दी. इसका मतलब है कि उन्होंने कुल मामलों का लगभग 99.6% में ज़मानत मंजूर की.
अख़बार के मुताबिक, इन आदेशों की भाषा और संरचना भी लगभग एक जैसी देखी गई. ज्यादातर मामलों में ज़मानत के लिए 20-20 हजार रुपये की दो ज़मानतदारों के साथ व्यक्तिगत बॉन्ड देने का निर्देश दिया गया. अलग-अलग परिस्थितियों में मौत होने के बावजूद आदेशों की भाषा और तर्क काफी हद तक समान थे.
समझ से परे है कि हाईकोर्ट कहना क्या चाहता है: सुप्रीम कोर्ट
उल्लेखनीय है कि 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही ज़मानत आदेश को रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि आदेश पढ़कर समझ ही नहीं आता कि हाईकोर्ट आखिर क्या कहना चाहता है और इतने गंभीर अपराध में आरोपी को ज़मानत देने का आधार क्या था.

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