
बांग्लादेश की हिंसा से बंगाल और असम की पॉलिटिक्स में बेचैनी क्यों है? ध्रुवीकरण से किसका नुकसान
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बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के द्वारा दीप चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या के खिलाफ दिल्ली से लेकर कोलकाता तक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. बांग्लादेश की हिंसा से असम और बंगाल की सियासत में भी बेचैनी बढ़ गई है, क्योंकि इन दोनों राज्यों में 2026 में चुनाव हैं.
2024 में बांग्लादेश में हुए हिंसक आंदोलन के चलते शेख हसीना को सत्ता ही नहीं, बल्कि देश छोड़ना पड़ गया था. इसके बाद से कटरपंथियों के निशाने पर अल्पसंख्यक खासकर हिंदू समाज के लोग हैं. इंकलाब मंच के नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद कट्टरपंथी सड़कों पर हैं. प्रदर्शनकारियों ने दीप चंद्र दास नाम के हिंदू युवक की बहुत निर्ममता से पीट-पीटकर हत्या कर दी, जिस लेकर भारत के कई शहरों में हिंदू संगठन लगातार विरोध प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं.
बांग्लादेश में हिंदू की हत्या के खिलाफ दिल्ली से लेकर कोलकाता के बांग्लादेशी दूतावासों का घेराव विश्व हिंदू परिषद और हिंदू संगठनों ने किया. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बांग्लादेश के हालात का पश्चिम बंगाल और असम की राजनीति पर भी असर पड़ेगा?
बांग्लादेश की हिंसा का इम्पैक्ट क्या होगा?
बांग्लादेश में हिंसा ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव के लिए सियासी सरगर्मी तेज है. माना जा रहा है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हालिया हिंसा का असर पश्चिम बंगाल और असम की राजनीति पर काफी गहरा और सीधा पड़ सकता है.
असम और पश्चिम बंगाल दोनों राज्यों की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं, इसलिए वहां होने वाली कोई भी उथल-पुथल यहां के सामाजिक और चुनावी समीकरणों को तुरंत प्रभावित कर सकती है. असम और बंगाल में इसे जनसांख्यिकीय (demographic) बदलाव और अवैध घुसपैठ के पुराने मुद्दे से जोड़कर देखा जा रहा है, जो चुनाव में सियासी असर डाल सकता है. हेमंत बिस्वा सरमा लगातार कह रह हैं कि घुसपैठियों की शिनाख्त और उन्हें बाहर निकालकर ही दम लेंगे.

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