
नीतीश कुमार के CM फेस पर राजनाथ की मुहर के बाद किसी और की मंजूरी जरूरी है क्या?
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बिहार चुनाव से पहले राजनाथ सिंह ने नीतीश कुमार को एनडीए का मुख्यमंत्री चेहरा बताया है, लेकिन अमित शाह के संसदीय बोर्ड वाले बयान के बाद संशय के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे हैं - आखिर बिहार में महाराष्ट्र फॉर्मूले की आशंका खत्म क्यों नहीं हो रही है?
बारह साल बाद राजनाथ सिंह के बयान का नीतीश कुमार पर क्या असर हुआ है, जानना और समझना बेहद महत्वपूर्ण है. वैसे ये मालूम भी तभी हो पाएगा जब कोई प्रतिक्रिया सामने आये. नीतीश कुमार की तरफ से, या किसी जेडीयू प्रवक्ता के माध्यम से.
2013 में राजनाथ सिंह ने ही नरेंद्र मोदी को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने की घोषणा की थी, और इस बार नीतीश कुमार को आने वाले बिहार चुनाव में एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया है.
राजनाथ सिंह के बयान के बाद ही नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़ने का फैसला कर लिया, और 2014 का चुनाव बीजेपी से अलग होकर लड़े. 2015 के बिहार चुनाव में तो कट्टर राजनीतिक विरोधी लालू यादव से भी हाथ मिला लिया था.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ताजा और पुराने बयान में एक बुनियादी फर्क है. मोदी के नाम की घोषणा राजनाथ सिंह ने बीजेपी के संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद की थी, लेकिन नीतीश कुमार के मामले में अभी बीजेपी संसदीय बोर्ड की मंजूरी का पेच फंसा हुआ है - और मुश्किल ये है कि ये पेच भी किसी और ने नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का फंसाया हुआ है.
पक्का मान लें, या कुछ बाकी भी है?
सितंबर, 2013 के बीजेपी की प्रेस कांफ्रेंस में राजनाथ सिंह ने कहा था, भारतीय जनता पार्टी हमेशा अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करती रही है… संसदीय बोर्ड फैसला किया है… नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनाव के लिए भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए.

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