
तारिक के आने से यूनुस होंगे OUT? समझें- खालिदा के बेटे की बांग्लादेश वापसी के भारत के लिए क्या मायने
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अगर बांग्लादेश में सबकुछ सही रहता है और 12 फरवरी 2026 को संसदीय चुनाव कराए जाते हैं तो इन चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तारिक रहमान ही होंगे.
जिस बांग्लादेश को भारत ने साल 1971 के युद्ध में पाकिस्तान से आजादी दिलाई थी, उस बांग्लादेश के साथ आज भारत के रिश्ते नाज़ुक मोड़ पर हैं. बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार और भारत विरोधी भावनाओं के बीच बड़ा सवाल यही है कि बांग्लादेश अब किधर जाएगा. ये सवाल आज और जरूरी इसलिए हो जाता है क्योंकि 17 वर्षों के बाद गुरुवार को तारिक रहमान की बांग्लादेश में घर वापसी हुई है. 60 साल के तारिक रहमान पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं.
आज से 17 साल पहले 2008 में जब तारिक रहमान बांग्लादेश छोड़कर लंदन गए थे, तब उन पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप थे. ये भी कहा जाता है कि उस वक्त तारिक रहमान ने बांग्लादेश से बाहर निकलने के लिए सेना की मदद ली. उन्होंने उस वक्त की कार्यवाहक सरकार को एक शपथपत्र सौंपा, जिसमें ये गारंटी दी गई कि वो बांग्लादेश की राजनीति में वापस कभी नहीं लौटेंगे. इस शपथ पत्र को बांग्लादेश ने आजतक संभाल कर रखा है. लेकिन तारिक रहमान ने अपनी कसम तोड़ दी है. वो ना सिर्फ 17 साल बाद अपने परिवार के साथ लंदन से बांग्लादेश वापस लौट आए हैं बल्कि अब उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है. इतने वर्षों बाद जब तारिक रहमान अपने परिवार के साथ बांग्लादेश की राजधानी ढाका लौटे, तब एक लाख से ज्यादा लोगों ने उनका स्वागत किया.
तारिक रहमान ने अपनी वतन वापसी को 'पिक्चर-परफेक्ट' दिखाने के लिए बांग्लादेश की जमीन को छूकर उसका नमन भी किया और अपने देश की मिट्टी को अपनी मुट्ठी में बंद करके अपने समर्थकों का जोश भी बढ़ाया.इसे समय का ही चक्र कहेंगे कि आज जिस जगह तारिक रहमान खड़े हैं, उस जगह 17 साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीन खड़ी थीं. साल 2008 में जब तारिक रहमान ने बांग्लादेश छोड़ा, तब शेख हसीन को बांग्लादेश की सेना और कार्यवाहक सरकार दोनों का समर्थन मिला था. इसी समर्थन से शेख हसीना 2009 से 2024 तक लगातार 15 साल बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं लेकिन अब ये स्थिति पूरी तरह बदल गई है.
मुजीबवाद और जियावाद की सियासत में लिपटा बांग्लादेश
अब शेख हसीना बांग्लादेश में नहीं हैं और तारिक रहमान 17 वर्षों के बाद लंदन से बांग्लादेश लौट आए हैं. ऐसा इसलिए भी मुमकिन हो पाया क्योंकि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने तारिक रहमान पर दर्ज कई मुकदमों को वापस ले लिया और उन्हें एक नया राजनीतिक जीवनदान दिया. ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि बांग्लादेश की राजनीति अब तक दो परिवारों के हवाले रही है. इनमें शेख हसीना का परिवार मुजीबवाद पर चला है और खालिदा जिया का परिवार जियावाद पर चला है. यहां मुजीबवाद का मतलब बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब रहमान से है और जियावाद का मतलब जनरल जियाउर रहमान से है.
26 मार्च 1971 को जब शेख मुजीब उर रहमान ने बांग्लादेश की आजादी का ऐलान किया था, तब इसकी घोषणा जियाउर रहमान ने ही की थी. ये वो दौर था, जब बांग्लादेश की राजनीति में जियावाद का प्रवेश नहीं हुआ था. इसकी पहली झलक साल 1975 के बाद देखी गई, जब सेना के कुछ अधिकारियों ने शेख मुजीब उर रहमान और उनके परिवार की हत्या करवा दी. उस वक्त शेख हसीना यूरोप में थीं इसलिए उनकी जान बच गई लेकिन यहां से बांग्लादेश की राजनीति में एक नया टर्निंग प्वॉइंट आया. जियाउर रहमान बांग्लादेश की सत्ता का केंद्र बन गए और बाद में उन्होंने सेना से अलग होकर बीएनपी नाम की पार्टी बना ली. साल 1991 में जियाउर रहमान की पत्नी खालिदा जिया पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी और कहते हैं कि इस सरकार में जिस नेता का सबसे अधिक दखल था, वो नेता खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान थे.

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