
कॉलेज पॉलिटिक्स, वकालत, कांग्रेस और फिर बीजेपी... असम में हिमंत कैसे चढ़ते गए सत्ता की सीढ़ियां
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कॉलेज पॉलिटिक्स से सियासी सफर का आगाज किया था. मुख्य धारा की राजनीति के डेब्यू चुनाव में हिमंत को हार का सामना करना पड़ा था. दूसरे प्रयास में पहली जीत का स्वाद चखने वाले हिमंत न सिर्फ असम की सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुए, बल्कि पूर्वोत्तर पॉलिटिक्स की धुरी बनकर भी उभरे.
असम में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और इन चुनावों में फोकस पॉइंट हैं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सीएम हिमंत की अगुवाई में इस बार जीत की हैट्रिक लगाने की उम्मीद है. साल 1996 के असम चुनाव से चुनावी राजनीति में उतरे हिमंत का डेब्यू उतना शानदार नहीं रहा, जितना इसके बाद का सफर नजर आता है. पांच बार के विधायक सीएम हिमंत का शुरुआती जीवन, कॉलेज पॉलिटिक्स से कांग्रेस और बीजेपी... अब तक का सफर कैसा रहा है?
एक फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में जन्में हिमंत के पिता कैलाशनाथ सरमा साहित्यकार थे. उनकी गिनती असम के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार के रूप में होती है. हिमंत की मां मृणालिनी सरमा असम की साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी रहीं. गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई के दौरान वह ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़ गए. कॉटन कॉलेज की छात्र राजनीति से निकले हिमंत ने न सिर्फ असम की सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय किया. बल्कि इससे भी कहीं आगे वह पूर्वोत्तर की सियासत की धुरी बनकर उभरे.
जिसने किया मार्गदर्शन, उसी के खिलाफ चुनावी डेब्यू
हिमंत बिस्वा सरमा ने कॉलेज पॉलिटिक्स के दिनों में प्रफुल्ल महंत और भुगु फुकन के साथ काम किया. यह दोनों ही चेहरे साल 1979 से 1985 तक चले असम आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से रहे. इन्होंने बाद में असम गण परिषद नाम से राजनीतिक पार्टी बना ली थी. हिमंत ने मुख्य धारा की राजनीति में जब कदम रखा, पहला विधानसभा चुनाव कॉलेज पॉलिटिक्स के दिनों में मार्गदर्शन करने वाले भृगु फुकन के ही खिलाफ लड़ा. वह साल 1996 था. हालांकि, हिमंत को तब शिकस्त झेलनी पड़ी थी.
सैकिया ने दिया प्रोत्साहन, तरुण गोगोई ने तराशा
हिमंत बिस्वा सरमा को राजनीति में आने के लिए तब के कद्दावर कांग्रेस नेता हितेश्वर सैकिया ने प्रोत्साहित किया. हितेश्वर सैकिया ने हिमंत को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहन दिया. हिमंत ने गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी. साल 2001 के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें जालुकबारी सीट से भृगु फुकन के ही खिलाफ उम्मीदवार बनाया.

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