
इलाहाबाद हाईकोर्ट जस्टिस यादव पर विवाद बढ़ा, महाभियोग का BJP को भी समर्थन करना चाहिये | Opinion
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव ने जो बातें कहकर विवाद खड़ा कर दिया था, अब सुप्रीम कोर्ट ने उस पर संज्ञान ले लिया है. जाहिर है कि मामला बढ़ता हुआ नजर आ रहा है. अब मुश्किल बीजेपी के लिए है कि उसे जज की बातों का समर्थन करना है या निष्पक्ष न्यायाकि व्यवस्था के लिए खड़ा होना है.
इलााहाबाद हाईकोर्ट के एक जज की बात पर पूरा देश भड़का हुआ है. दरअसल कुछ दिनों पहले विश्व हिंदू परिषद (VHP) के एक प्रोग्राम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव ने बहुसंख्यकों के पक्ष में बोलकर बवाल खड़ा कर दिया था. यादव ने अपने स्पीच में कहा था कि मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है कि यह देश हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की इच्छा के मुताबिक चलेगा. यह कानून है, कानून, यकीनन बहुसंख्यकों के मुताबिक काम करता है. इसे परिवार या समाज के संदर्भ में देखें, केवल वही स्वीकार किया जाएगा, जो बहुसंख्यकों के कल्याण और खुशी के लिए फायदेमंद हो. हालांकि शेखर यादव ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो कानून सम्मत न हो. लोकतंत्र की परिभाषा ही बहुमत को ध्यान में रखकर गढ़ी गई है. पर बहुत सी बातों को कहा नहीं जाता.
समाज के अभिभावक को तो इस तरह की बाते बिल्कुल भी नहीं कहनी चाहिए. न्यायधीश हमारे व्यवस्था के अभिभावक हैं .समाज उनसे उम्मीद करता है कि वो आदर्श स्थिति को बनाएं रखें. बहुमत की बात करने के लिए राजनीतिज्ञ तो हैं हीं. हालांकि धीर गंभीर राजनीतिज्ञ भी ऐसी बातें नहीं करते हैं जिसमें अलगाव का गंध आती हो. पर दरअसल देश में जो चल रहा होता है उसके असर न्यायपालिका भी अछूती नहीं रहती है. आखिर जज कोई मशीन तो हैं नहीं. समाज में रहने वाला इंसान ही कल को जज बनता है. जिस तरह की परवरिश समाज में उसकी होती है उस तरह समाज की विभिन्न हिस्सों की परिभाषा उसके मन में बनती जाती है. पिछले 10 सालों से देश में बीजेपी का राज है. भारतीय जनता पार्टी की राजनीति बहुसंख्यकों के हित लाभ को ध्यान में होती है इसलिए जाहिर है कि सत्ता के विचारों से शासन के सभी अंग प्रभावित होंगे ही. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले स्वत:संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट से विस्तृत जानकारी मांगी है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मामला विचाराधीन है. हाईकोर्ट से विस्तृत जानकारी मांगी गई है. इसके पहले कैंपेन फॉर ज्यूडीशियल अकाउंटैबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) ने शेखर यादव की शिकायत चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को चिट्ठी लिखकर की थी. इस चिट्ठी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव के बयान की इन-हाउस जांच की मांग की गई है. चिट्ठी में मांग की गई है कि जांच होने तक जस्टिस को सभी न्यायिक कार्यों से दूर रखा जाए. अब इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस शेखर कुमार यादव की ओर से दी गई स्पीच की न्यूज पेपर्स में छपी रिपोर्ट पर ध्यान देकर हाईकोर्ट से डिटेल में इसका ब्योरा मांगा है.
शेखर ने जो बातें कहीं वो तो नेता कहने से भी हिचकते हैं
जज शेखर यादव एक तो विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में बोल रहे थे. दूसरे उनका भाषण एक समुदाय के खिलाफ हो रहा था. आम तौर पर एक सरकारी अधिकारी या जज से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जाती है. भारतीय जनता पार्टी के भी बहुत से नेता ऐसा हैं जो बड़े ओहदों और महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभालते हैं पर इस तरह की बात नहीं करते हैं. जज शेखर यादव ने मुस्लिम समुदाय का नाम लिए बिना कहा, कई पत्नियां रखना, तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाएं अस्वीकार्य हैं. अगर आप कहते हैं कि हमारा पर्सनल लॉ इसकी अनुमति देता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा. आप उस महिला का अपमान नहीं कर सकते, जिसे हमारे शास्त्रों और वेदों में देवी की मान्यता दी गई है. आप चार पत्नियां रखने, हलाला करने या तीन तलाक के अधिकार का दावा नहीं कर सकते. आप कहते हैं, हमें तीन तलाक देने और महिलाओं को भरण-पोषण न देने का अधिकार है लेकिन यह अधिकार काम नहीं करेगा... कठमुल्ला शब्द गलत है, लेकिन यह कहने में परहेज नहीं है क्योंकि वो देश के लिए बुरा है. वो जनता को भड़काने वाले लोग हैं. देश आगे न बढ़े, इस तरह की सोच रखने वाले लोग हैं. उनसे सावधान रहने की जरूरत है.’
शेखर यादव की एक एक लाइन इस तरह की लग रही है जैसे कोई हिंदुत्व समर्थक पार्टी का नेता बोल रहा हो.जाहिर है कि इस तरह की भाषा एक हाईकोर्ट के जज को शोभा नहीं देती है. न्यायाधीश के सामने सभी धर्म -जाति-राज्य -समुदाय के लोग बराबर होते हैं. दुनिया में धर्म के आधार पर बने राज्यों में भी जज अपने देश में अल्पसंख्यकों के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल नहीं करते.

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