
आबादी के आधार पर बढ़ी सांसदों की संख्या तो क्या होगा असर? नॉर्थ बनाम साउथ की क्यों छिड़ गई बहस
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नए संसद भवन के लोकसभा चैम्बर में 888 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है. दरअसल, 2026 के बाद लोकसभा सीटों का परिसीमन होना है, जिसके बाद सांसदों की संख्या बढ़ने की संभावना है. लेकिन इस पर बवाल शुरू हो गया है. दक्षिणी राज्यों ने आबादी के आधार पर परिसीमन पर सवाल उठाए हैं. क्या है ये मामला? आबादी के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को उत्तरी राज्यों से क्या है आपत्ति? समझिए...
नया संसद भवन तैयार है. इसके उद्घाटन को लेकर तो विवाद हुआ है. लेकिन अब एक नया बवाल शुरू हो गया है. और वो बवाल है- लोकसभा सीटों को लेकर.
दरअसल, इस वक्त लोकसभा सीटों की संख्या 545 है. सीटों की ये संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय है. सीटों की ये संख्या 2026 तक इतनी ही रहेगी, लेकिन इसके बाद बढ़ने की संभावना है. यही वजह है कि नई संसद में लोकसभा चैम्बर में 888 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की गई है.
लेकिन अब इस पर बवाल हो रहा है. क्योंकि 2026 के बाद लोकसभा सीटों की संख्या आबादी के हिसाब से बढ़ेगी. इसे लेकर दक्षिण बनाम उत्तर भारत की नई जंग शुरू हो गई है. दक्षिणी राज्यों ने आबादी के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर आपत्ति जताई है.
तेलंगाना के मंत्री और भारत राष्ट्र समिति के नेता केटी रामाराव का कहना है कि अगर आबादी के हिसाब से लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाता है तो ये दक्षिणी राज्यों के साथ 'घोर नाइंसाफी' होगी.
दक्षिणी राज्यों को कड़ी सजा...!
रामाराव का कहना है कि आबादी कंट्रोल करने वाले केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना को उनकी प्रगतिशील नीतियों के लिए कड़ी सजा दी जा रही है.

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