
आदिवासी वोटों पर पकड़, बेदाग छवि... BJP के पाले में गए चंपाई तो JMM को होगा कितना नुकसान?
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झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने बगावत कर दी है. ऐसे समय में जब झारखंड के विधानसभा चुनाव करीब हैं, चंपाई बीजेपी के पाले में गए तो सत्ताधारी जेएमएम को कितना नुकसान होगा?
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के वरिष्ठ नेताओं में शुमार रहे चंपाई सोरेन ने पार्टी छोड़ने की बात साफ कर दी है. चंपाई ने आगे के प्लान पर विकल्पों के संकेत जरूर दिए हैं लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा है. कुछ महीनों में ही झारखंड विधानसभा के चुनाव होने हैं और ऐसे में कयास उनके भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जॉइन करने के भी हैं. अटकलों-कयासों के बीच बात इसे लेकर भी हो रही है कि कोल्हान टाइगर चंपाई झारखंड की सियासत में कितने पावरफुल हैं और उनकी पकड़ जमीन पर कितनी मजबूत है?
कोल्हान टाइगर कितने पावरफुल
कोल्हान टाइगर चंपाई सोरेन झारखंड की प्रभावशाली संथाल जनजाति से आते हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड की कुल 3 करोड़ 29 लाख 88 हजार 134 की आबादी में जनजातियों की भागीदारी 86 लाख 45 हजार 42 लोगों की है. इसमें भी अकेले संथाल आबादी ही 27 लाख 54 हजार 723 लाख है. चंपाई सोरेन संथाल जनजाति के शीर्ष नेताओं में गिने जाते हैं. झारखंड राज्य की मांग को लेकर हुए आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले चंपाई की अन्य जनजाति के लोगों के बीच भी मजबूत पैठ मानी जाती है.
चंपाई सोरेन जिस कोल्हान रीजन से आते हैं, उस रीजन में सरायकेला, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिले आते हैं. इन तीन जिलों में विधानसभा की 14 सीटें हैं. 2019 के झारखंड चुनाव में बीजेपी इस रीजन में खाता तक नहीं खोल पाई थी. जेएमएम को इस रीजन की 11 सीटों पर जीत मिली थी जबकि दो सीट पर कांग्रेस और एक से निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली थी.
तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास को भी जमशेदपुर सीट पर शिकस्त का सामना करना पड़ा था. जमशेदपुर सीट भी कोल्हान रीजन में ही आती है. इसके लिए चंपाई की वोटर्स पर पकड़ के साथ ही मजबूत किलेबंदी और रणनीति को भी दिया गया था. कोल्हान को अगर जेएमएम का गढ़ कहा जाता है तो उसके रणनीतिकार चंपाई माने जाते हैं.
चंपाई सोरेन के बागी होने की वजह क्या है?

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