
आंकड़ों में नक्सलवाद: क्या भारत में कमजोर पड़ रहा है नक्सली आंदोलन?
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2025 तक आते-आते तस्वीर काफी बदल चुकी है. इस साल ऐसी घटनाओं की संख्या घटकर 137 रह गई. इन घटनाओं में 52 नागरिक और 33 सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि मारे गए नक्सलियों की संख्या बढ़कर 383 हो गई. यानी घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन सुरक्षा बलों की कार्रवाई ज्यादा प्रभावी और निर्णायक हुई है.
ओडिशा के कंधमाल जिले में सुरक्षा बलों ने हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई में चार माओवादियों को मार गिराया, जिनमें शीर्ष नक्सली नेता गणेश उइके भी शामिल था. यह घटना ऐसे समय पर हुई है, जब देश में नक्सलवाद की चुनौती पहले के मुकाबले काफी कमजोर होती दिख रही है.
आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा में लगातार गिरावट आई है. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (SATP) के आंकड़ों के मुताबिक, माओवादी हिंसा से जुड़ी हत्याओं की घटनाएं पिछले कई वर्षों में तेज़ी से घटी हैं. वर्ष 2016 में नक्सली हिंसा से जुड़ी 263 घटनाएं दर्ज की गई थीं. इनमें 122 आम नागरिक, 62 सुरक्षाकर्मी और 250 नक्सली मारे गए थे.
2025 तक आते-आते तस्वीर काफी बदल चुकी है. इस साल ऐसी घटनाओं की संख्या घटकर 137 रह गई. इन घटनाओं में 52 नागरिक और 33 सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि मारे गए नक्सलियों की संख्या बढ़कर 383 हो गई. यानी घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन सुरक्षा बलों की कार्रवाई ज्यादा प्रभावी और निर्णायक हुई है.
क्या है रेड कॉरिडोर?
नक्सली संगठन मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के दूरदराज़ और जंगलों वाले इलाकों में सक्रिय रहे हैं. इन क्षेत्रों को मिलाकर ‘रेड कॉरिडोर’ कहा जाता है. लंबे समय तक इन इलाकों में पुलिस थानों, सुरक्षा बलों और सरकार समर्थक माने जाने वाले नागरिकों पर हमले होते रहे.
लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं. 2016 में जहां कुल 263 हत्याएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या लगभग आधी होकर 137 रह गई. उसी तरह 2016 में 250 नक्सली मारे गए थे, जबकि 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 383 पहुंच गया. साफ है कि हमले कम हुए हैं, लेकिन नक्सलियों को होने वाला नुकसान कहीं ज्यादा बढ़ा है.

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