
Ground Report: नोटरी पर बीवियां, रेट 10 हजार से शुरू, ‘रिसेल’ में भी उपलब्ध, ‘माल’ वापसी तक की गारंटी!
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‘पांच साल पहले शादी के नाम पर झारखंड से यहां भेजी गई. आने पर पता लगा कि पति के पैर खराब हैं. जल्द ही कई भेद खुलते चले गए. वो दिनरात पीता. मारपीट करता. लेकिन- इन सबसे ऊपर- वो मुझे डेढ़ लाख में खरीदकर लाया था. भड़कने पर दूसरे को बेच देने की धमकी देता.’ 'शादी नहीं हुई थी उससे आपकी?' ‘नहीं. सौ रुपये के स्टाम्प पर लीवीन (लिव-इन) हुआ. मेरे जैसी यहां भतेरी (काफी) हैं.’
शिवपुरी! मध्यप्रदेश का बेहद हराभरा ये शहर पहली नजर में किसी भी मंझोले आम इलाके जैसा लगेगा. सांवली-सुस्त सड़कों पर धुआं उड़ेलती गाड़ियां. पुरानी ढब के मकान-दुकान. चौराहों पर पान के साथ गप्पें चबाते पुरुष. और सिर पर घूंघट काढ़े औरतें. ज्यादातर ओडीशा, झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ से आई हुईं. ब्याहता की तरह लगती ये औरतें खरीदकर लाई गई हैं. गलियों में ढेर के ढेर एजेंट्स. आप जरूरत बताइए, वे लड़की दिलवाएंगे. कीमत 10 हजार से लेकर कई लाख तक. पसंद न आने पर रीसेल की गुंजाइश भी. खरीदार किसी झंझट-मुसीबत में न फंस जाए, इसके लिए राजीनामे का करार भी.
कुछ सालों पहले तक शिवपुरी में एक परंपरा हुआ करती थी- धड़ीचा. इसमें पेपर पर लिखा-पढ़ी के साथ औरतें खरीदी-बेची या किराये पर ली जाती थीं. भाड़े पर लेने की मियाद कुछ महीनों से लेकर सालों तक हो सकती थी. प्रथा ऊपरी तौर पर बंद हो चुकी, लेकिन परदे की ओट में सबकुछ वही. पुराने जानकार इसे दधीचा, खरीचा, लड़ीचा जैसे कई नाम देते हैं.
थोड़ा खोजने पर फॉर्मेट लेकर बैठे नोटरी बाबू भी मिलेंगे और ‘फ्रेश मौड़ी’ दिलवाने वाले बिचौलिए भी. वे हाथ के हाथ आपको दो-चार फोटो दिखा देंगे. पसंद कीजिए और हफ्तेभर में लड़की आपकी. बस, उम्र, रंगरूप और ताजा-पुरानी के आधार पर कीमत बदल जाएगी.
अंदरुनी बीमारी की तरह फलती-फूलती इस परंपरा को टटोलने हम दिल्ली से निकले. आगरा-बॉम्बे नेशनल हाइवे होते हुए लगभग 8 घंटे में शिवपुरी पहुंच जाएंगे. पोहरी तहसील हमारा पड़ाव था, जहां करार पर लाई हुई लड़कियों और एजेंटों से हमारी मुलाकात होनी थी.
कुछ पति भी टकराए, जिनकी औरतें उन्हें छोड़कर भाग चुकीं. उखड़े लहजे में वे कहते हैं- 'पैसे भी गए. मौड़ी (लड़की) भी. भाग जाएगी, अंदाजा होता तो बेचकर ‘लागत’ ही निकाल लेते.'

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