
Ground Report: दर्दिस्तान...गुरेज में बसा कश्मीर का इलाका, उसका अनसुना ‘दर्द’ और भुला दी गई दास्तान!
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बीतते वक्त की गंध! श्रीनगर से जैसे-जैसे उत्तर की तरफ बढ़ें, एक खास गंध लपककर हाथ थाम लेगी और साथ चल पड़ेगी. एक उम्र जितने पुराने लकड़ी के घरों से आती ये महक 'दर्द शिना' की पहचान है! पाकिस्तानी कबीलाइयों का आतंक झेलकर भी साबुत बचा रहा समुदाय अब वक्त की दीमक के हवाले है. देवदारी काठ के घरों की जगह सीमेंट के होटल. और ठहराव से घुलमिल होती आपाधापी. कश्मीर की ये सबसे पुरानी ट्राइब थमने और बढ़ने के बीच अटकी हुई है.
श्रीनगर से करीब 140 किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ एक घाटी है. गुरेज. बीचोंबीच किशनगंगा नदी जो पाकिस्तान जाकर नीलम हो जाती है. लाइन ऑफ कंट्रोल के बेहद करीब बसा ये इलाका दर्दिस्तान भी कहलाता रहा. दर्द ट्राइब का घर. संवेदनशील हिस्सा होने की वजह से यहां दशकों तक आवाजाही बंद रही. बची-खुची कसर पूरी कर दी छमाही पड़ती बर्फ ने. ये समुदाय लंबे वक्त तक दुनिया से कटा रहा.
अब बंदिशें हट चुकीं. ग्लोबल वार्मिंग ने बर्फीले सुरक्षा कवच को भी कमजोर कर दिया. आवाजाही बढ़ रही है लेकिन साथ ही भूली कहानियों जितनी पुरानी इस सभ्यता पर खत्म होने का खतरा भी बढ़ चुका है.
aajtak.in ने उत्तरी कश्मीर की गुरेज घाटी समेत LoC के करीब बसे आखिरी गांव चकवाली तक की यात्रा की, और शिना समुदाय के साथ एक दिन गुजारा.
श्रीनगर से आगे बढ़ते हुए बांदीपोरा जिला आएगा. सपाट सड़कें यहां से तीखे और छोटे मोड़ वाले पहाड़ी रास्तों में बदल जाएंगी. जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, गाड़ियां कम होती हुईं. उनकी जगह चरवाहे-भेड़ें और घास का गट्ठर लिए लौटती महिलाएं फ्रेम में आती हुईं. निश्चित दूरी पर चेक पोस्ट बने हुए, जो पूरी तसल्ली के बाद ही आगे जाने देते हैं.
लगभग छह घंटे बाद हम गुरेज सब-डिवीजन के हेडक्वार्टर दावर में हैं. यहां डाक बंगले में बैठकर आगे जाने का प्लान पक्का होता है. सैन्य इजाजत ली जाती है. अगली सुबह आगे की यात्रा शुरू.
हम घाटी से नीचे की तरफ गुरेज सब-डिवीजन के तहत आने वाले तुलैल ब्लॉक की तरफ बढ़ते हैं. पूरी घाटी की आबादी बमुश्किल चालीस हजार. छिटके हुए लकड़ी के घर, जिनमें बुजुर्ग या नए युवा जोड़े रहते हैं, जो बाहर बसना अफोर्ड न कर सकते हों. ज्यादातर घर दो मंजिला. नीचे की तरफ मवेशी और ऊपर परिवार बसे हुए. 'सर्दियों में सब जम जाता है, तब भेड़-बकरियों का साथ गर्मी देता है.' भेड़ की ऊन से बना चूगा (ओवरकोट) पहने गुलाम मोहम्मद बताते हैं. गुलाम आसपास के इलाके में सबसे बुजुर्ग शख्स हैं. लगभग 105 साल के. गांववाले भी इस बात की तस्दीक करते हैं. ‘बंटवारे से काफी पहले की इनकी पैदाइश है. कबीलाई हमले की तो इन्हें सारी कहानी याद है. कुछ जोर-आजमाइश भी की थी.’कबीलाई हमला! चिकनी-सतर देह पर फफोले की उभरी ये याद हर पुराने दिल पर दिखेगी. साठ-सत्तर की उम्र जी चुके लगभग सभी ने उस हमले की बात दोहराई. दरअसल गुरेज घाटी कश्मीर के उस किनारे पर बसी है, जहां से जरा आगे बढ़ो तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की हद शुरू हो जाएगी. घाटी एक वक्त पर कश्मीर को मध्य एशिया से जोड़ने वाला दर्रा हुआ करती थी. लेकिन साल 1947 के बाद बहुत कुछ बदल गया. बंटवारे के कुछ महीने बाद पाकिस्तान से कबीलाई लड़ाके बड़ी संख्या में गिलगित-बाल्टिस्तान से लगती गुरेज घाटी में पहुंचे. कुछ बारामूला और उरी की तरफ बढ़ गए, जबकि बहुत से यहीं कत्लेआम मचाने लगे. रास्ते में पड़ने वाले गांव के गांव जला दिए गए. महिलाओं से गैंग रेप हुआ. बच्चे मार दिए गए. ये वही लोग थे, जिनसे कभी गुरेजियों का रोटी-बेटी का रिश्ता हुआ करता.

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