
Exclusive: मोनिंदर सिंह पंढेर ने बताया निठारी कांड का काला सच, सुरेंद्र कोली के बारे में कही ये बात...
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निठारी कांड में रिहा हुए मोनिंदर सिंह पंढेर का पहला एक्सक्लूसिव इंटरव्यू. साल 2006 में डी-5 कोठी के पीछे मिले कंकालों, सुरेंद्र कोली, पुलिस जांच, मीडिया दबाव और पायल केस पर पंढेर ने बताया पूरा सच. पढ़ें निठारी कांड से जुड़ी ये अनसुनी कहानी.
Moninder Singh Pandher: नोएडा के निठारी कांड की कहानी आज भी लोगों का दिल दहला देती है. निठारी में मौजूद कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की कोठी के पीछे 29 दिसंबर 2006 को एक नाले से कई बच्चों के कंकाल मिले थे. और यहीं से शुरू हुई इस खौफनाक कांड की कहानी. निठारी कांड में बच्चों और लड़कियों को शिकार बनाया गया था. साल 2005 से 2006 के बीच निठारी में रहने वाले दर्जनों बच्चे और लड़कियां लापता हो गए थे. जिनमें से अधिकतर के कंकाल और अवशेष उसी नाले और आसपास के इलाकों से बरामद हुए थे.
इस मामले के दो मुख्य आरोपी थे. कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उनका नौकर सुरेंद्र कोली. मोनिंदर इस केस में पहले बरी हो चुके हैं और उनका नौकर भी हाल ही में रिहा हो गया. जिसे कभी 'नरभक्षी' तक कहा गया था.
इस मामले में रिहा होने वाले निठारी की कोठी नंबर डी-5 के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर ने आजतक से खास बातचीत की. ये रिहा होने के बाद उनका एक्सक्लूसिव इंटरव्यू है. जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड का सच बयां करने की कोशिश की है.
सवाल- निठारी का सच क्या था?
जवाब- यह प्रश्न विवेचकों से पूछना चाहिए. इस मामले में जो जांच हुई उसमें मेरे खिलाफ कोई आरोप पत्र सीबीआई ने दाखिल नहीं किया था. जहां तक मर्डर और रेप का ताल्लुक था. मेरे को आरोपी किसी एजेंसी ने नहीं बनाया था. मेरे को कोर्ट ने लोगों के प्रेशर और बयानों के आधार पर और उस समय के माहौल को देखते हुए मुझे आरोपी बनाया गया था. इसमें जिम्मेवार कौन है? क्या पुलिस जिम्मेवार है? क्या मैं जिम्मेवार हूं? क्या कोई और जिम्मेवार है नहीं. इसके लिए बहुत लोग जिम्मेवार हैं. अगर सही जांच होती तो सच सामने आ जाता. कोई भी होता. मैं ये नहीं कहता कि सत्य में क्या निकलता. उस विषय में मैं किसी के बारे में कह नहीं सकता. पर मैं जो बात कह सकता हूं आसानी से, कि अगर उसमें दखल ना दिया जाता, ये हाइप ना क्रिएट किया होता, ये फ्रेंजी ना बनती. तो डैफेनेटली जांच सही रास्ते पर चलती. जो आज कमियां नजर आ रही हैं. जो आप प्रश्न एक दूसरे पूछ रहे हैं. सबसे पहले वो प्रश्न आप अपने आप से पूछो. क्या इस केस में दखल वाजिब था? क्या पब्लिक और मीडिया के पास ये अधिकार है कि वह समांतर जांच चला सके? टोटली इनवेस्टिगेशन को मिस लीड कर दे. उसको पब्लिक और मीडिया ने जाने नहीं दिया.
सवाल - आपको लगता है कि ये सब मीडिया के दबाव की वजह से हुआ?

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