
EWS रिजर्वेशन: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या टूट गई है 50 फीसदी आरक्षण की सीमा?
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सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस के लिए 10 फीसदी आरक्षण को बरकरार रखा है. चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने इस मामले में 3-2 से फैसला सुनाया, जिसके बाद सामान्य जाति के लोगों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या आरक्षण के 50 फीसदी की सीमा खत्म हो जाएगी?
आर्थिक रूप से सामान्य वर्ग के कमजोर तबके को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहरा दिया है. चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच में तीन जजों ने माना कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण पूरी तरह से संवैधानिक है जबकि दो जजों ने इसके खिलाफ में अपना फैसला दिया. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में भर्ती में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगा दी है. कोर्ट के इस फैसले के बाद आरक्षण पर बहस के अब नए मोर्चे खुल गए हैं. जहां फैसले के पॉजिटिव और निगेटिव असर पर बात हो रही है, वहीं कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं जिनका सामना भविष्य में करना पड़ सकता है.
10 सवर्ण आरक्षण का दायरा क्या बढ़ सकता है
दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में राजनीतिक अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर हरीश वानखेड़े कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस को उस दस फीसदी आरक्षण को सही ठहराया है, जो साल 2019 से पहले संविधान के मूल ढांचे में था ही नहीं. इस फैसले के बाद गरीब सवर्णों को अभी 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगी है, लेकिन भविष्य में इस 10 फीसदी के दायरे को सरकारें वोटों की राजनीतिक के चलते बढ़ा भी सकती हैं.
आर्थिक आधार पर आरक्षण का खुला रास्ता
हरीश वानखेड़े कहते हैं कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले से देश में आर्थिक आरक्षण का रास्ता खोल दिया है. अभी तक, आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को दिया जाता था, लेकिन अब आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को भी आरक्षण मिलेगा. भविष्य में आर्थिक आधार पर ही आरक्षण लागू करने की मांग जोर पकड़ सकती है, लंबे समय से कुछ लोग ये मांग कर भी रहे थे.
प्रोफेसर वानखेडे ने कहा कि जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने अपना फैसला पढ़ते समय कहा है कि आजादी के 75 साल के बाद हमें समाज के व्यापक हित में आरक्षण की व्यवस्था पर फिर से विचार करने की जरूरत है. यह बयान ही बता रहा है कि आरक्षण पर किस तरह से संकट गहरा रहा है.

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