
CAFE-3 पर बड़ा दांव, गाड़ियों के माइलेज पर सख्त होगी सरकार! PMO भेजा गया प्रस्ताव
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CAFE-3 नियमों का मकसद पैसेंजर व्हीकल की फ्यूल एफिशिएंसी यानी माइलेज को बेहतर बनाना और कार्बन उत्सर्जन को कम करना है. अब तक इस नए नियम के दो ड्रॉफ्ट सामने आ चुके हैं. जिसको लेकर ऑटो इंडस्ट्री में विवाद भी बढ़ा था. कुछ कार निर्माताओं का मानना था कि, इसका सीधा लाभ उन कंपनियों को मिलेगा जो ज्यादातर छोटी कारें बनाते हैं.
देश में गाड़ियों के फ्यूल नियमों को लेकर एक बड़ी ख़बर सामने आई है. सरकार अब वाहनों की माइलेज और कार्बन उत्सर्जन को और सख्त करने की तैयारी में है. मिनिस्ट्री ऑफ पावर ने कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी यानी CAFE-3 नियमों का प्रस्ताव प्रधानमंत्री कार्यालय को मंजूरी के लिए भेज दिया है. इस कदम को ऑटो सेक्टर में बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है.
भारी उद्योग मंत्री एच. डी. कुमारस्वामी ने बुधवार को FICCI द्वारा आयोजित इलेक्ट्रिक वाहनों के नेशनल कांफ्रेंस के दौरान पत्रकारों से बातचीत में कहा कि, मंत्रालय ने इंडस्ट्री के रिप्रेजेंटेटिव्स से चर्चा करने के बाद यह प्रस्ताव पीएमओ को भेजा है. हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि सितंबर में जारी ड्राफ्ट में कोई बदलाव किया गया है या नहीं. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि छोटे वाहनों को राहत देने वाला वही ड्राफ्ट पीएमओ को भेजा गया है या उसमें कोई बदलाव किया गया है.
CAFE-3 नियमों का मकसद पैसेंजर व्हीकल की फ्यूल एफिशिएंसी यानी माइलेज को बेहतर बनाना और कार्बन उत्सर्जन को कम करना है. अब तक CAFE-3 के दो ड्राफ्ट सामने आ चुके हैं और इन पर ऑटो इंडस्ट्री में लगातार चर्चा होती रही है. CAFE नियम के तहत सरकार हर वाहन निर्माता के पूरे फ्लीट (वाहनों के पोर्टफोलियो) के लिए औसत फ्यूल एफिशिएंसी का एक न्यूनतम टार्गेट सेट करती है. इसके साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन की अधिकतम सीमा भी तय की जाती है. यह नियम किसी एक मॉडल पर नहीं बल्कि कंपनी द्वारा बेची गई सभी गाड़ियों के औसत के आधार पर लागू होता है.
सितंबर 2025 में जारी दूसरे मसौदे में अप्रैल 2027 से औसत CO₂ उत्सर्जन को और सख्त करने का प्रस्ताव दिया गया था. साथ ही छोटी पेट्रोल कारों को कुछ राहत देने की बात भी कही गई थी. चार मीटर से कम लंबाई, 1200 सीसी तक इंजन और 909 किलोग्राम तक वजन वाली गाड़ियों को बेड़े के प्रदर्शन की गणना में प्रति किलोमीटर 3 ग्राम CO₂ की अतिरिक्त छूट मिल सकती थी. हालांकि यह छूट प्रति मॉडल अधिकतम 9 ग्राम प्रति किलोमीटर तक ही सीमित रखी गई थी.
ड्राफ्ट में छोटी कारों को राहत देने के बात पर इंडस्ट्री में बड़ा विवाद शुरू हो गया था. कई वाहन निर्माता कंपनियां जिनके पोर्टफोलियो में बड़ी कारें जैसी एसयूवी, एमपीवी इत्यादि ज्यादा मात्रा में शामिल हैं, उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी. उन्होंने इस प्रस्ताव को केवल मारुति सुजुकी जैसी कंपनियों के फायदेमंद माना था, जिसके पोर्टफोलियो में सबसे ज्यादा एंट्री लेवल, हैचबैक या कॉम्पैक्ट कारें शामिल हैं. खबरों के अनुसार बाद में मसौदे में बदलाव कर छोटी कारों को दी जाने वाली कुछ राहत को हटाया गया है.
सख्त नियमों के कारण खासकर एंट्री लेवल पेट्रोल कारों की लागत बढ़ सकती है. कंपनियों को तय टार्गेट को पूरा करने के लिए नई फ्यूल एफिशिएंट तकनीक पर काम करना पड़ सकता है. इसका सीधा असर कारों की कीमत पर देखने को मिलेगा. जिससे कम दाम वाली छोटी कारें भी महंगी हो सकती हैं. हालांकि एक्सपर्ट मानते हैं कि यह कदम भारत के कार बाजार में बड़े बदलाव का संकेत है. नियमों के पालन से बढ़ती लागत से हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर लोग तेजी से आगे बढ़ेंगे.

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