
BJP या RJD... बिहार में किसे भारी पड़ेगी ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई? जानिए
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बिहार में मनोज झा की संसद में सुनाई कविता पर हंगामा मचा हुआ है. ठाकुर का कुआं कविता पर ठाकुर और ब्राह्मण आमने-सामने आ गए हैं. लोकसभा चुनाव करीब हैं इसलिए करीब हफ्तेभर बाद विवाद को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. जातियों के मकड़जाल में उलझे बिहार में बीजेपी या आरजेडी, किसको सियासी नफा होगा और किसको नुकसान?
बिहार की राजनीति और जातीय समीकरण में चोली-दामन का साथ रहा है. गोटी सटीक बैठ गई तो सूबे की सत्ता का शीर्ष मिलना तय है और राजनीतिक दलों का समीकरण गड़बड़ाया तो विपक्ष में बैठना. विधानसभा में विपक्ष की बेंच से ट्रेजरी बेंच का सफर इन्हीं उलझे हुए जातीय समीकरणों से होकर गुजरता है. जिसने साध लिया, वही सिकंदर. लोकसभा चुनाव में करीब छह महीने का समय शेष बचा है और बिहार में जाति पर बवाल शुरू हो गया है.
राजपूत और ब्राह्मण नेता आमने-सामने हैं. दरअसल, सूबे के सत्ताधारी महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद डॉक्टर मनोज झा ने संसद में महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान एक कविता सुनाई थी- 'ठाकुर का कुआं'. राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा 21 सितंबर को हुई थी. बिल उसी दिन पास भी हो गया लेकिन हफ्तेभर के भीतर ही मनोज झा के भाषण को लेकर हंगामा मच गया.
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मनोज झा के खिलाफ उनकी ही पार्टी के विधायक चेतन आनंद ने मोर्चा खोल दिया है. चेतन आनंद ने मनोज झा पर कविता के जरिए पूरे ठाकुर समाज को विलेन के रूप में पेश करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ठाकुर सभी को साथ लेकर चलते हैं. समाजवाद में किसी एक जाति को टारगेट करना समाजवाद के नाम पर दोगलापन है. मनोज झा का बयान आरजेडी को ए टू जेड की पार्टी बनाने की कोशिशों के लिए झटका है. चेतन आनंद ने इस मुद्दे को लालू यादव के सामने उठाने की बात कही तो वहीं उनके पिता आनंद मोहन ने भी मनोज झा पर हमला बोला.
आनंद मोहन ने कहा कि बहस जब महिला आरक्षण पर चल रही थी तो फिर बीच में ठाकुर कैसे आ गया. आनंद मोहन ने कहा कि अगर मैं राज्यसभा में होता तो जीभ खींचकर सभापति के पास आसन की ओर उछाल देता. हम जिंदा कौम के लोग हैं, ये अपमान बर्दाश्त नहीं होगा. ठाकुर का कुआं को लेकर आरजेडी के विधायक चेतन आनंद और उनके पिता आनंद मोहन ने सांसद मनोज झा पर एक समाज के अपमान का आरोप लगाया.
मनोज झा के संसद में दिए भाषण को हफ्तेभर हो चुका है और ठाकुर अस्मिता की बात अब उठ रही है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सियासी नफा-नुकसान का गुणा-भाग करने के बाद सोच-समझकर इसे विवाद की शक्ल दी जा रही है? सवाल ये भी उठ रहे हैं कि अगर मनोज झा ने संसद में कविता सुनाकर ठाकुर समाज को टारगेट किया, अपमान किया तो चेतन आनंद को ये हफ्तेभर बाद समझ आया?

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