
10 साल पहले खारिज, अब मंजूर: अरावली खनन पर केंद्र के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट ने किया स्वीकार
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अरावली पर्वत श्रृंखला में जो मामला सामने आय है उसने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. जिस 100 मीटर की परिभाषा को अदालत ने 2010 में खारिज किया था, उसी को अब मंजूरी दी गई है. पर्यावरण विशेषज्ञ इसे अरावली और पश्चिमी भारत के लिए गंभीर खतरा बता रहे हैं.
अरावली पर्वत श्रृंखला में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया मामले ने पर्यावरण संरक्षण और सरकारी नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस 100 मीटर की परिभाषा को शीर्ष अदालत करीब 10-15 साल पहले खारिज कर चुकी थी, उसी को अब केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर स्वीकार कर लिया गया है.
दिलचस्प बात यह है कि जिन शर्तों और परिभाषाओं को सुप्रीम कोर्ट ने अब मंजूरी दी है, उनका विरोध पहले उसी उच्चाधिकार प्राप्त पैनल ने किया था, जिसे अदालत ने वर्ष 2002 में अरावली और वन संरक्षण के लिए सुझाव देने के उद्देश्य से गठित किया था.
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पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस नई परिभाषा से अरावली की करीब 90 प्रतिशत पर्वतमाला संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकती है. इससे खनन माफिया को सीधा फायदा मिलेगा और राजस्थान और गुजरात के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है. विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली न सिर्फ भूजल रिचार्ज बल्कि पश्चिमी भारत की जलवायु संतुलन के लिए भी बेहद अहम है.
केंद्र सरकार ने 100 मीटर का मापदंड बनाया
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की परिभाषा के अनुसार, अरावली की निचली पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे में आती हैं. एफएसआई ने राजस्थान के 15 जिलों में फैले 40,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को तीन डिग्री ढलान वाली निचली अरावली पर्वत श्रृंखला के रूप में चिन्हित किया है. इन्हें पहले अरावली संरक्षण का हिस्सा माना गया था, लेकिन मंत्रालय के 100 मीटर के नए मापदंड में इन्हें बाहर कर दिया गया है.

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