
सूरत के श्मशान में लकड़ियों की किल्लत, शव जलाने के लिए किया जा रहा गन्ने की खोई का इस्तेमाल
AajTak
सूरत शहर के सभी श्मशानों में शवों के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां कम पड़ रही हैं. इसलिए चीनी मिल से बगास यानी खोई भेजी जा रही है.
गुजरात के सूरत शहर में कोरोना का कहर निरंतर जारी है. कोरोना के कहर के बीच सरकारी मृतकों की संख्या का मायाजाल अलग है, और श्मशानों में हो रहे शवों के अंतिम संस्कारों की संख्या अलग है. कोरोना से होने वाली मौतें इतनी अधिक हो रही हैं कि शहर के श्मशानों में लकड़ियां कम पड़ जा रही हैं, ऐसे में चीनी मीलों से भेजी जा रही खोई यानी कि बगास का इस्तेमाल शवों को जलाने के लिए हो रहा है. सूरत शहर में पहले मुख्य रूप से तीन श्मशान हुआ करते थे. इनमे से एक जहांगीरपुरा कुरुक्षेत्र श्मशान, दूसरा रामनाथ घेला श्मशान और तीसरा अश्वनी कुमार श्मशान है. मगर कोरोना की दूसरी लहर में मृतकों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि दो और नए श्मशान शुरू करने पड़े हैं. नए श्मशान में से एक शहर के लिंबायत क्षेत्र में शुरू किया गया है, जबकि दूसरा पाल इलाक़े में कैलाशमोक्ष धाम श्मशान नाम से शुरू किया गया है. इसके अलावा पुराने सभी तीनों श्मशानों में शवों के अंतिम संस्कार के लिए ऐसी चिंताएँ तैयार की गयी हैं. जहाँ 24 घंटे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया जारी रहती है.
आज जब वक्त इतना कीमती हो गया है कि लोग हरेक चीज की दस मिनट में डिलीवरी चाहते हैं. वहीं दूसरी तरफ विडंबना ये है कि भारत का एक शहर ऐसा है जहां इंसान को कहीं जाने के लिए सड़कों पर ट्रैफिक में फंसना पड़ता है. यहां हर साल औसतन 168 घंटे लोग ट्रैफिक में फंसे रहते हैं. यानी पूरे एक हफ्ते का समय सिर्फ ट्रैफिक में चला जाता है.

जिस शहर की फायरब्रिगेड के पास छोटे से तालाब के पानी से एक शख्स को निकालने के लिए टूल नहीं है, वह किसी बड़े हादसे से कैसे निबटेगा. युवराज मेहता की मौत ने नोएडा की आपदा राहत तैयारियां की कलई खोल दी है. सवाल यह है कि जब नोएडा जैसे यूपी के सबसे समृद्ध शहर में ये हालात हैं तो बाकी शहर-कस्बों की स्थिति कितनी खतरनाक होगी.

दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार के कारण कमीशन ऑफ एयर क्वालिटी इंप्रवूमेंट (CAQM) ने GRAP-3 पाबंदियां हटा दी हैं. AQI में सुधार के चलते अब कंस्ट्रक्शन और आवाजाही पर लगी पाबंदियों में राहत मिली है. IMD के पूर्वानुमान के अनुसार, आने वाले दिनों में AQI 'एवरेज' से 'खराब' श्रेणी में रह सकता है, जिसके कारण GRAP-3 के तहत गंभीर पाबंदियां लागू नहीं की जाएंगी.

AIMIM प्रवक्ता वारिस पठान ने स्पष्ट किया है कि मुसलमानों ने अब फैसला कर लिया है कि वे अब किसी भी ऐसे व्यक्ति को समर्थन नहीं देंगे जो केवल जातीय विभाजन करता है, बल्कि वे उस नेता के साथ जाएंगे जो विकास की बात करता है. उनका यह बयान समाज में सकारात्मक बदलाव और विकास को प्राथमिकता देने की दिशा में है. मुसलमान अब ऐसे नेताओं के साथ खड़े होंगे जो उनकी बेहतरी और समाज के समग्र विकास के लिए काम करें.









