
सरदार उधम: उग्र राष्ट्रवाद का शिकार हुए बिना कई परतों में छिपी एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी…
The Wire
उधम सिंह और भगत सिंह के चरित्रों को एक संदर्भ देते हुए शूजीत सरकार दो महत्वपूर्ण लक्ष्यों को साध लेते हैं. पहला, वे क्रांतिकारियों को वर्तमान संकीर्ण राष्ट्रवाद के विमर्श के चश्मे से दिखाई जाने वाली उनकी छवि से और बड़ा और बेहतर बनाकर पेश करते हैं. दूसरा, वे आज़ादी के असली मर्म की मिसाल पेश करते हैं. क्योंकि जब सवाल आज़ादी का आता है, तो सिर्फ दो सवाल मायने रखते हैं: किसकी और किससे आज़ादी?
अनेक भारतीयों की तरह मैं भी ‘एक आंख के बदले आंख से पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी’, को मोहनदास करमचंद गांधी का कथन मानता था. यह बात मेरे अंदर इतनी गहराई तक घुस गई थी कि यह कथन वास्तव में किसका है, इसकी जांच करने का ख्याल मेरे मन में कभी आया ही नहीं. बॉलीवुड की कई देशभक्ति वाली फिल्मों में भी यही मानसिकता झलकती है. ये फिल्में आजादी के योद्धाओं को हाड़-मांस के इंसान के तौर पर न देखकर एक प्रतीक के तौर पर पेश करती थीं – और उनका बेढंगा सामान्यीकरण करती थीं, उनकी जटिलताओं को छानकर उन्हें मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के लिए एक सुंदर माल में बदल देती थीं. समय के साथ यह प्रवृत्ति और खराब होती गई.
पिछले सात सालों में बॉलीवुड के जबरा राष्ट्रवाद के बारे में काफी कुछ लिखा गया है. लेकिन अमेजन प्राइम वीडियोज, पर दिखाई जा रही शूजीत सरकार की हालिया फिल्म सरदार उधम ऐसी कमजोरियों को परे रखते कुछ ऐसा दिखाती है, जो बॉलीवुड के लिए विरल है : एक क्रांतिकारी और उसके विचार, एक विद्रोही और उसके -महाद्वीपों के आरपार फैले- सहयोगी, एक व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व- जो लापरवाह सामान्यीकरणों और उथले चरित्रांकन में आनंदित होने वाली संकीर्ण मानसिकता से दागदार नहीं हुए हैं.
रितेश साह और शुभेंदु भट्टाचार्य द्वारा लिखित सरदार उधम ज्यादातर जीवनी आधारित फिल्मों की क्रमबद्ध जीवन वर्णन करने वाली शैली का त्याग करके एक नॉन-लीनियर नैरेटिव (यानी बिना किसी सीक्वेंस को अपनाए) के प्रयोग से भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण दास्तां को बयान करती है.
अगर एक इंसानी जीवन को कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं में सीमित किया जा सकता, तो उधम सिंह (विकी कौशल) की जिंदगी कुछ इस तरह से होती: जालियांवाला बाग नरसंहार (अप्रैल, 1919) का साक्षी बनना, पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर की हत्या (मार्च, 1940), फांसी (जुलाई, 1940).

यह त्रासदी नवंबर 2014 में बिलासपुर ज़िले के नेमिचंद जैन अस्पताल (सकरी), गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में आयोजित सरकारी सामूहिक नसबंदी शिविरों के दौरान हुई थी. ज़िला अदालत ने आरोपी सर्जन को ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया और दो साल की क़ैद, 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया.

वी-डेम की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक दुनिया में 92 तानाशाही वाले देश और 87 लोकतांत्रिक देश मौजूद थे. भारत अभी भी 'चुनावी तानाशाह' बना हुआ है, इस श्रेणी में वह 2017 में शामिल हुआ था. 179 देशों में सें भारत लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स में 105वें स्थान पर है. पिछले वर्ष यह 100वें स्थान पर था.

बीते 3 फरवरी को बजट सत्र के पहले चरण के दौरान लोकसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद अनुशासनहीन व्यवहार के लिए सात कांग्रेस सांसदों और एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद को निलंबित कर दिया गया था. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सोमवार को सभी दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी, जिसमें इन सदस्यों का निलंबन वापस लेने पर सहमति बनी.

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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच केंद्र सरकार भले ही एलपीजी की किल्लत से इनकार कर रही है लेकिन गैस एजेंसियों पर लंबी क़तारें हैं. गैस की किल्लत से जूझते लोगों के वीडियो सोशल मीडिया पर आ रहे हैं. वहीं, दिल्ली में कुछ अटल कैंटीन बंद हैं, कई हॉस्टल मेस और गुरुद्वारों में लंगर भी सिलेंडर की कमी प्रभावित हो रहे हैं.

मनरेगा के राज्य-स्तरीय तथ्य एक राजनीतिक रूप से असहज स्वरूप दिखाते हैं. यह कार्यक्रम उन इलाकों में सबसे सफल नहीं रहा जहां ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी, बल्कि वहां बेहतर रहा जहां प्रशासनिक ढांचा मज़बूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट थी. केरल और ओडिशा के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा अधिकार से अधिक प्रशासनिक योजना बन गई है, ऐसे में वीबी-जी राम जी को क्या अलग करना होगा?

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