
यूपी हेट क्राइम: योगी से लेकर अख़लाक़ के हत्यारों तक आरोपियों को सरकारी राहत मिली
The Wire
योगी आदित्यनाथ की पहचान भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से विशेष रही कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.
भगवाधारी अजय सिंह बिष्ट, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से भाजपा के टिकट पर पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं, 2017 से भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं. जब वे साधु बने और फिर गोरखपुर में स्थित एक हिंदू मंदिर, गोरखनाथ मठ के महंत या मुख्य पुजारी बने, तो उन्होंने योगी आदित्यनाथ नाम अपना लिया.
उनके लोकसभा प्रोफाइल में उन्हें ‘धर्म प्रचारक और समाज सेवक’ बताया गया है. उन्होंने ‘हिंदू युवा वाहिनी’ नाम के एक युवा संगठन की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया; इस संगठन पर अक्सर सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और हिंसा में भाग लेने का आरोप लगता रहा है. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.
भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से उनकी विशेष पहचान बनी कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की.
कट्टरपंथी साधु का उदय
धीरेंद्र झा ने ‘कारवां’ और ‘अल जज़ीरा’ में आदित्यनाथ के साधु जीवन और राजनीतिक जीवन का एक दिलचस्प ब्योरा पेश किया है. उनका जन्म 5 जून 1972 को मसलगांव के एक ठाकुर परिवार में हुआ था. यह गांव अब उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में पड़ता है. उनके पिता एक फ़ॉरेस्ट रेंजर थे और मां एक गृहिणी थीं. उन्होंने विज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की. वे आरएसएस की छात्र शाखा, ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ में शामिल हो गए और छात्र संघ चुनाव में सचिव पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.
मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान 1992 में गोरखपुर स्थित ‘गोरखनाथ मठ’ में उनकी मुलाक़ात महंत अवैद्यनाथ से हुई. अगले ही साल अवैद्यनाथ ने उन्हें साधु के रूप में दीक्षा दी, उनका नाम ‘आदित्यनाथ’ रखा और उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

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मनरेगा के राज्य-स्तरीय तथ्य एक राजनीतिक रूप से असहज स्वरूप दिखाते हैं. यह कार्यक्रम उन इलाकों में सबसे सफल नहीं रहा जहां ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी, बल्कि वहां बेहतर रहा जहां प्रशासनिक ढांचा मज़बूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट थी. केरल और ओडिशा के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा अधिकार से अधिक प्रशासनिक योजना बन गई है, ऐसे में वीबी-जी राम जी को क्या अलग करना होगा?

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