
ट्रांसजेंडर अधिकार क़ानून में संशोधनों का क्यों हो रहा है विरोध
The Wire
केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन के लिए एक विधेयक पेश किया है, जो ट्रांसजेंडर लोगों के आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार’ को ख़त्म करता है और ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को बदलता है. ट्रांसजेंडर समुदाय समेत विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इस विधेयक का व्यापक विरोध किया जा रहा है.
नई दिल्ली: बारह वर्ष पहले राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार ट्रांसजेंडर पहचान को मान्यता देते हुए कहा था कि ‘लिंग का आत्म-निर्धारण व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति का अभिन्न हिस्सा है.’
इसी फैसले ने ही ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 का आधार तैयार किया था.
हालांकि, पिछले हफ्ते केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा पेश किया गया एक विधेयक इस कानून से अलग दिशा में जाता है. केंद्र सरकार ने 13 मार्च को 2019 के इस कानून में संशोधन के लिए एक बिल पेश किया, जो ट्रांसजेंडर लोगों के आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार’ को खत्म करता है और ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को बदलता है.
कहा जा रहा है कि यह विधेयक अब फिर से तय करता है कि ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ किसे कहा जाएगा और उनके आत्म-निर्धारण के अधिकार को छीनता है.
बिल के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्ति की नई परिभाषा ‘ऐसे व्यक्ति के रूप में होगी जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसी हो, या यूनेक (eunuch) हो,’ या ऐसा व्यक्ति जिसमें ‘इंटरसेक्स भिन्नताएं’ हों, या ‘ऐसा व्यक्ति जो जन्म के समय लिंग संबंधी विशेषताओं में जन्मजात भिन्नता रखता हो,’ जैसे प्राथमिक यौन विशेषताएं, बाहरी जननांग, क्रोमोसोम पैटर्न, गोनाडल विकास, हार्मोन उत्पादन या प्रतिक्रिया, या अन्य चिकित्सीय स्थितियां.
इसमें यह भी जोड़ा गया है कि कोई भी व्यक्ति या बच्चा ‘जिसे बलपूर्वक, प्रलोभन, बहकावे, धोखे या अनुचित दबाव के जरिए, सहमति के साथ या बिना, ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया हो,’ जैसे अंग-भंग, नपुंसक बनाना, बधियाकरण, अंग विच्छेदन या किसी सर्जिकल, रासायनिक या हार्मोनल प्रक्रिया के जरिए, उसे भी इस परिभाषा में शामिल किया जाएगा.

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