
संघ के 100 साल: जब नेहरू के पक्ष में खुलकर सामने आए गोलवलकर, खुद लिखी चिट्ठी, घर-घर भिजवाया
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1957 में जब नेहरू देश के पीएम थे जो उन्हें महाराष्ट्र में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था. संयुक्त महाराष्ट्र को लेकर राज्य की जनता आंदोलित थी. ऐन मौके पर गुरु गोलवलकर ने दखल दिया और नेहरू के समर्थन में चिट्ठी लिखकर उसकी लाखों प्रतियां पूरे महाराष्ट्र में बंटवाईं. दरअसल ये मुद्दा ही ऐसा था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी घटना का वर्णन.
ये बात वाकई में आज चौंकाने वाली हो सकती है, उनके लिए भी जो संघ को पसंद करते हैं और उनके लिए भी जो नहीं करते हैं. आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि गुरु गोलवलकर को पंडित नेहरू का समर्थन करना पड़ा? फिर समर्थन ही करते, पर नहीं, सारे संगठन को लगाकर एक एक स्वयंसेवक को महाराष्ट्र के घर-घर में उनका नेहरू के समर्थन में लिखा पत्र भेजने की जरूरत क्या थी?
ये मामला हाल ही में तब भी सामने आया था, जब महाराष्ट्र के राजकोट में पीएम मोदी द्वारा अनावरित की गई छत्रपति शिवाजी की मूर्ति गिर गई. जब बीजपी सरकार पर कांग्रेस इस घटना को लेकर हमलावर हुई तो जवाब में महाराष्ट्र सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने पंडित नेहरू का वही मुद्दा उछाल दिया, जो इस लेख से जुड़ा है.
लेकिन ये दिलचस्प बात हो सकती है कि शायद फडणवीस को भी शायद ये ना याद हो कि उस मुद्दे में नेहरूजी की गलती होते हुए भी गुरु गोलवलकर ने उनका समर्थन किया था. दरअसल ये बात 1957 की है, जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी आजादी के बाद बॉम्बे राज्य बन चुका था और गुजरात, महाराष्ट्र दोनों इसी के हिस्से थे. 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य को गुजरात और महाराष्ट्र दो अलग अलग राज्य बनाने से पहले वहां संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन चल रहा था. केन्द्र में पंडित नेहरू की सरकार इससे बड़ी परेशान थी, इंदिरा गांधी निजी तौर पर भी अपने पिता की सहायता के लिए वहां के दौरे कर रही थीं. यहां तक कि एक बार पंडित नेहरू पर यहां हमला भी हो चुका था.
महाराष्ट्र का बंटवारा और नेहरू की योजना
ऐसे में पंडित नेहरू ने मराठों को खुश करने के लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. प्रतापगढ़ किले को छत्रपति शिवाजी ने बनवाया था, उसे 300 साल हो गए थे. इसी किले में शिवाजी और अफजल खान की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था. पंडित नेहरू ने शिवाजी की 17 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का निर्माण करवाया और उसे 1957 में लगाने का ऐलान कर दिया. खुद पंडित नेहरू 30 नवम्बर 1957 को उस प्रतिमा का अनावरण करने वाले थे. लेकिन ये चाल उलटी पड़ गई. दरअसल मराठी नेहरू से पहले से ही नाराज थे, नेहरू जी के इस ऐलान से मानो घाव हरे ही हो गए.
दरअसल पंडित नेहरू ने अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में छत्रपति शिवाजी को छोटा मोटा सामंत, उपद्रवी जैसे कुछ शब्दों के प्रयोग से साथ उनको छोटे से भाग में समेट दिया था. हालांकि पवन खेड़ा का दावा है कि 1936 में पहला अंक आते ही उन्हें गलती का अहसास हुआ था, उन्होंने पत्र लिखकर खेद जताया था और उसके अगले संस्करण में संशोधन करवा दिए थे. लेकिन लोग नहीं माने और ऐलान करने लगे कि ऐसे व्यक्ति के हाथों जो शिवाजी महाराज का सम्मान ही ना करता हो, उनके हिंदवी साम्राज्य के स्वप्न का जिसे पता तक ना हो, जिसने इस बात की महत्ता को ही ना समझा हो कि कैसे शिवाजी ने मुगलों की ताकत पर ना केवल लगाम लगाई, बल्कि उनके सामने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद खड़े रहकर भारत के सम्मान को बचाए रखा, उस व्यक्ति के हाथ कैसे शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण हो सकता है.

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