
संघ के 100 साल: गोलवलकर और मुखर्जी में हुई वो बातचीत जिसके बाद बना था भारतीय जनसंघ
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कभी जनसंघ को संघ के राजनीतिक संगठन के रूप में प्रचारित किया जाने लगा. गोलवलकर इस नैरेटिव को लेकर सहज नहीं थे. गोलवलकर ने तो एक बार जनसंघ के लिए संघ के कार्यकर्ताओं को देने तक से इनकार कर दिया था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी घटना का वर्णन.
जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के 3 साल बाद 2 जुलाई 1956 को संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर ने पांचजन्य में एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने शायद पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से एक राजनीतिक पार्टी (भारतीय जनसंघ) बनाने को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी से 1951 में की गई मुलाकात के बारे में लिखा. संघ के राजनीतिक संगठन के तौर पर जनसंघ को प्रचारित किया जा रहा था, ऐसे में इस लेख में गुरु गोलवलकर ने उन सवालों का जबाव देने की कोशिश की जो लोग पूछ रहे थे कि आखिर जनसंघ की स्थापना के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गुरु गोलवलकर के बीच क्या चर्चा हुई थी.
गुरु गोलवलकर के इस लेख के मुताबिक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने संगठन जनसंघ के लिए संघ के स्वयंसेवकों की मांग की तो उन्होंने मुखर्जी से कहा कि संघ को राजनीति में नहीं घसीटा जा सकता. संघ किसी भी राजनीतिक दल के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई भी संगठन किसी राजनीतिक दल का उपकरण बनकर राष्ट्रीय पुनरुत्थान प्राप्त नहीं कर सकता. इसलिए संघ को एक उपकरण (साधन) के रूप में उपयोग करना असंभव है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बात को स्वीकार कर लिया. उन्हें इस वास्तविकता का खुद अनुभव भी था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी कहा कि कोई राजनीतिक दल भी किसी अन्य संगठन के नियंत्रण में नहीं रह सकता. संघ प्रमुख गोलवलकर के मुताबिक इस तरह दोनों के बीच इस प्रस्तावित राजनीतिक दल के साथ संघ के आपसी रिश्तों को लेकर सामंजस्य बन गया था.
अब दूसरी समस्या थी कि इस राजनीतिक दल का उद्देश्य क्या होना चाहिए? संघ का लक्ष्य और कार्यपद्धति पहले से ही स्पष्ट थी. इसलिए यह भी स्पष्ट था कि यदि नई पार्टी संघ स्वयंसेवकों से सहयोग की अपेक्षा रखती है, तो उसके आदर्श संघ जैसे ही होने चाहिए. इस तथ्यात्मक आधार को डॉ. मुखर्जी ने भी स्वीकार कर लिया. ऐसे में एक सवाल और उठा था कि संघ के युवा और वरिष्ठ स्वयंसेवक अनेक संगठनों में कार्यरत हैं, इनमें से कुछ जन संगठन हैं. जबकि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित हैं. भविष्य में कुछ नए संगठन भी उभर सकते हैं. यदि नए व पुराने संगठनों के संघ के साथ संबंधों का प्रश्न उठता है, तो गुरु गोलवलकर का उत्तर एक दिशानिर्देश की तरह है.
संघ प्रमुख ने कहा कि संघ ने जहां भी किसी कार्यकर्ता को भेजा, वह अडिग रहा और उस क्षेत्र में एक नया परिवर्तन लाया, संघ के स्वयंसेवक अतीत में भी इसी प्रकार आचरण करते रहे हैं और आज भी करते हैं. संघ का स्वयंसेवक जो भी कार्य करता है, वह उन कार्यकर्ताओं, उसकी नीतियों और उद्देश्यों को संघ की विचारधारा के अनुरूप लाने का प्रयास करता है और उसे जमीनी स्तर पर खड़ा करने के लिए स्वयं को समर्पित करता है.
ऐसा नहीं था कि संघ को राजनीति में लाने के प्रयास पहले नहीं हुए थे, डॉ हेडगेवार के समय संघ की बढ़ती शक्ति को देखकर उनके अलग-अलग दलों में सहयोगी इस तरह की कोशिश लगातार करते रहे थे, लेकिन डॉ हेडगेवार मालवीय जी, डॉ मुंजे, सावरकर बंधु, भाई परमानंद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे दिग्गज हिंदू महासभा के होते हुए किसी दूसरे ऐसे संगठन की जरूरत नहीं समझते थे, जो मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों का विरोध करने के लिए राजनीतिक रास्ता अपनाए. एक बार खुद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन्हें हिंदू डिफेंस लीग जैसी कोई संस्था बनाने का सुझाव दिया था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस उन्हें आजाद हिंद फौज जैसे संगठन बनाने के लिए मिलना चाहते थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई थी. सावरकर ने अपने साथियों के जरिए ड़ॉ हेडगेवार का नाम हिंदू महासभा के बैनर तले बने हिंदू सुरक्षा समूह श्रीराम सेना से बिना उनकी मर्जी जुड़वा दिया था. लेकिन डॉ हेडगेवार संघ के वयस्क होने तक, पूरे देश में विस्तार होने तक मानो उसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ के समर्थक नहीं थे. आखिर जनसंघ के लिए राजी क्यों हुए गुरु गोलवलकर
राजी तो गुरु गोलवलकर भी नहीं थे, तभी तो जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनसे 1943 में एक राजनीतिक संस्था के सुझाव के साथ मिले थे, तो गुरुजी ने उन्हें डॉ हेडगेवार का वक्तव्य दोहरा दिया था कि रोज की राजनीति से दूर रहना है. तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनसे सहमत नहीं दिखे थे क्योंकि बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार में हिंदुओं पर जो जुल्म हो रहा था, वो खुद अपनी आंखों से देख कर आए थे. ऐसे में जब संघ पर गांधी हत्या को लेकर प्रतिबंध लगाया गया, हजारों संघ कार्य़कर्ताओं सहित गुरु गोलवलकर को भी जेल में डाल दिया गया. बिना सुबूत के 1.5 साल तक संघ की गतिविधियों को रोक कर प्रतिबंध के जरिए उसको समाप्त करने की कोशिश नेहरू सरकार ने की, उससे संघ के अंदर भी ये दबाव बनने लगा था कि राजनीतिक दुश्मनों को जवाब देने के लिए अपने विचारों का, संघ हितैषी कोई संगठन तो होना ही चाहिए था. वैसे भी पटेल जैसे हितचिंतक की मौत के बाद पंडित नेहरू का सरकार के साथ साथ कांगेस संगठन पर भी पूरा कब्जा था. मुखर्जी का पहले हिंदू महासभा, फिर नेहरू सरकार से इस्तीफा

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