
श्रीलंका में नए राष्ट्रपति का आना भारत के लिए क्या लेकर आएगा, क्या मालदीव, बांग्लादेश की तरह बदलेगा समीकरण?
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भारत को पड़ोस में पहले ही दो झटके लग चुके. पहला मालदीव में मुइज्जू के सत्ता में आने से और दूसरा बांग्लादेशी सत्ता में उलटफेर से. अब श्रीलंका में भी नए राष्ट्रपति आ चुके हैं. अनुरा कुमारा दिसानायके सीधे-सीधे तो नहीं, तो लेकिन कई बार चीन के पक्ष में बात करते दिखे. तो क्या एक और अच्छे पड़ोसी के साथ हमारे रिश्ते तनाव में आ सकते हैं?
श्रीलंका के दिवालिया होने के बाद ये पहला राष्ट्रपति चुनाव था, जिसमें अनुरा कुमारा दिसानायके ने जीत हासिल की. ये पहले मार्क्सवादी लीडर हैं जो इस देश में इतने बड़े पद तक पहुंचे. श्रीलंका पिछले दो सालों से राजनैतिक के साथ-साथ आर्थिक उठापटक से भी जूझ रहा है. अब प्रेसिडेंट दिसानायके पर दोहरी जिम्मेदारी होगी. लेकिन साथ ही ये बात भी है कि भारत और चीन को लेकर उनका रवैया कैसा रहेगा, जबकि इससे पहले उनकी पार्टी जेवीपी कई बार भारत के खिलाफ बोल चुकी.
कौन हैं नए राष्ट्रपति 56 साल के दिसानायके मार्क्सवादी विचारधारा के हैं, जो अक्सर मजदूरों और निम्न-मध्यमवर्ग के साथ खड़े होने की बात करते रहे. नेशनल पीपल्स पावर (एनपीपी) से जीतकर आए नेता वामपंथी रुख रखते हैं, जो कि कोलंबो के लिए भी नई बात होगी. असल में इससे पहले देश में चुनी हुई सरकारें दक्षिणपंथी सोच वाली रहीं. यहां तक कि देश को लगभग डुबो देने वाले गोयबाया राजपक्षे भी राइट विंग सोच वाले माने जाते थे. उनके कार्यकाल में जब देश में आर्थिक भूचाल आया हुआ था तो दिसानायके उनके कट्टर विरोधी बनकर उभरे. यहां तक कि वे करप्शन को हटाने वाले चेहरे की तरह देखे जाने लगे और इसी उम्मीद में जनता ने उन्हें चुना.
दक्षिणपंथ से सीधे वामपंथ पर आना देश के लिए एक बड़ा बदलाव होगा. लेकिन बात श्रीलंका तक ही खत्म नहीं हो जाती, इसका असर अड़ोस-पड़ोस पर भी होगा, खासकर भारत और चीन पर.
दोनों ही देशों के लिए श्रीलंका बेहद अहम रहा. इसके कई कारण हैं. - हिंद महासागर में श्रीलंका ऐसी जगह बसा हुआ है, जो समुद्री व्यापार के सेंटर में आता है. पश्चिम और पूर्वी एशिया को जोड़ने वाले इस देश से ग्लोबल स्तर पर व्यापार होता रहा. चीन और भारत दोनों ही यहां अपनी मौजूदगी को सुरक्षित रखना चाहते हैं. लेकिन चीन अपने विस्तारवादी रवैए के साथ एक कदम आगे रहते हुए वहां के हंबनटोटा पोर्ट पर भी लगभग बस चुका है. - महासागर के इस हिस्से का सामरिक महत्व भी है. चूंकि श्रीलंका भारत के दक्षिणी तट के करीब है इसलिए भारत भी उससे बनाए रखना चाहता है. ये नौसैनिक रणनीति में काफी काम आ सकता है. - दोनों ही देशों ने यहां पर भारी निवेश कर रखा है. हालांकि भारत का रवैया नेबर फर्स्ट का रहा, वहीं चीन भारी पैसे तो लगाता है लेकिन साथ में भारी ब्याज भी वसूलता है. अब भी उसने यहां के इंफ्रा पर काफी कुछ लगाया हुआ है.
भारत या चीन में किसका पलड़ा रहेगा भारी दिसानायके के सामने कई चुनौतियां है, जिसमें सबसे बड़ी है- साल 2022 में आई अस्थिरता को दूर करना. लेकिन साथ ही साथ उनपर फॉरेन पॉलिसी में संतुलन का भी दबाव रहेगा. इससे पहले की सरकारों की विदेश नीति भारत और चीन दोनों को समान पलड़े पर रखने की कोशिश तो करती थी लेकिन कहीं न कहीं भारी निवेश और उसपर कर्ज के चलते चीन का पलड़ा भारी होता रहा.

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