
लार्ज कैप और ब्लू-चिप कंपनी में क्या फर्क? शेयर में निवेश से पहले जानें ये Trick
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ब्लू-चिप कंपनी होना केवल बड़े साइज का मामला नहीं है. ब्लू-चिप एक ऐसा टैग है, जो किसी कंपनी की क्वालिटी, भरोसे और स्थिरता को दर्शाता है. ब्लू-चिप कंपनियां वो कहलाती हैं, जो लगातार मुनाफा कमा रही हों, जिनका ब्रांड मजबूत हो, जिनकी बैलेंस शीट भी मजबूत हो.
हमेशा निवेशकों को सलाह दी जाती है कि शेयर बाजार में निवेश करते समय लार्ज कैप कंपनियों को चुनें. खासकर नए निवेशक को ब्लू चिप में निवेश सलाह दी जाती है. लेकिन अधिकतर निवेशक इस बात को लेकर कंफ्यूज रहते हैं कि लार्ज कैप और ब्लू चिप में क्या फर्क है.
दरअसल, शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर निवेशक अक्सर लार्ज कैप (Large Cap) और ब्लू-चिप (Blue Chip) शब्दों का इस्तेमाल एक ही अर्थ में कर देते हैं, लेकिन हकीकत में इन दोनों के बीच एक खास अंतर है. यह अंतर समझना निवेश के सही फैसले के लिए बेहद जरूरी है.
कैसे पहचाने लार्ज कैप कंपनी?
SEBI के नियमों के मुताबिक भारत में मार्केट कैप के आधार पर टॉप-100 कंपनियों को लार्ज कैप की कैटेगरी में रखा जाता है, यानी किसी कंपनी का शेयर जितना महंगा और जितने ज्यादा शेयर बाजार में मौजूद होते हैं, उसका मार्केट कैप उतना बड़ा होता है. आमतौर पर देखा जाए तो लार्ज कैप कंपनियों का मार्केट कैप 20,000 करोड़ रुपये से अधिक ही होता है. रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries), TCS, HDFC Bank और इंफोसिस (Infosys) जैसी कंपनियां इसी कैटेगरी में आती हैं. भारत में आमतौर पर 101 से 250 रैंक वाली कंपनियां मिडकैप मानी जाती हैं. इसके बाद की कंपनियां स्मॉल कैप कैटेगरी में आती हैं.
लार्ज कैप: 20,000 करोड़ रुपये से ऊपर. मिड कैप: 5,000 करोड़ रुपये- 20,000 करोड़ रुपये. स्मॉल कैप: 500 करोड़ रुपये- 5,000 करोड़ रुपये. माइक्रो कैप: 500 करोड़ रुपये से कम.
लेकिन ब्लू-चिप कंपनी होना केवल बड़े साइज का मामला नहीं है. ब्लू-चिप एक ऐसा टैग है, जो किसी कंपनी की क्वालिटी, भरोसे और स्थिरता को दर्शाता है. ब्लू-चिप कंपनियां वो कहलाती हैं, जो लगातार मुनाफा कमा रही हों, जिनका ब्रांड मजबूत हो, जिनकी बैलेंस शीट भी मजबूत हो.

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