
लगातार विस्फोट से बेहद ठंडी हो सकती है दुनिया, क्या ज्वालामुखी का फटना हिमयुग की शुरुआत हो सकती है?
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इथियोपिया में हायली गुब्बी ज्वालामुखी के फटने का असर भारत तक दिख रहा है. आसमान धूल और राख के गुबार से भर चुका, जिसकी वजह से कई इंटरनेशनल उड़ानें रद्द हो गईं. अगर वॉल्केनिक इरप्शन लगातार होता रहा तो धरती और आसमान के बीच धूल की मोटी परत आ जाएगी, जिससे तापमान काफी नीचे भी गिर सकता है.
इथियोपिया में लगभग बारह हजार साल बाद हायली गुब्बी ज्वालामुखी के फटने पर उससे पैदा राख और जहरीली गैसें हजारों किलोमीटर तक पहुंच गईं. भारत समेत कई देशों में इसका असर हवाई उड़ान पर हो रहा है. इस बीच एक चर्चा ये भी है कि जब एक ज्वालामुखी के फटने से इतना कुछ बदलता है, तो सुपर वॉल्केनिक इरप्शन की स्थिति में क्या होता है?
यहां एक बात समझने की ये है कि जब भी राख और गैसों की मोटी परत धरती और आसमान के आड़े आती है, तापमान नीचे गिरने लगता है. कई बार ये इतना नीचे चला जाता है कि बेमौसम सर्दियां पड़ने लगती हैं.
मिस्ट्री इरप्शन से बदल गई थी दुनिया
लगभग दो सदी पहले की एक घटना ज्वालामुखियों के इतिहास में सबसे रहस्यमयी मानी जाती है. 19वीं सदी की शुरुआत से कई सालों तक इंडोनेशिया के माउंट तंबोरा में लगातार ऐसे विस्फोट हुए, जिन्हें आज मिस्ट्री इरप्शन कहा जाता है. इन धमाकों के बारे में वैज्ञानिक रिकॉर्ड, गवाह और लोकल दस्तावेज, तीनों ही बहुत सीमित हैं.
तकनीक तब वैसी विकसित नहीं थी कि चीजें समझ आ पातीं. तब तंबोरा में लगातार इरप्शन हो रहा था. जल्द ही हवा में इतनी ज्यादा राख और सल्फेट एयरोसोल जमा हो गए कि सूरज की किरणें धरती तक पहुंचनी कम हो गईं. नतीजा यह हुआ कि तापमान में मामूली नहीं, बल्कि पूरे 1.7 डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आ गई. यह बहुत बड़ी बात थी.
इसका असर दुनिया भर में दिखा. यूरोप और उत्तरी अमेरिका में पूरे एक साल गर्मियां आई ही नहीं. भारी बर्फबारी हुई. फसलें लगभग तबाह हो गईं. एशिया में भी मानसून पैटर्न बिगड़ गया और अनाज का संकट छा गया.

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