
'लंगर में खाया, सड़क पर प्रैक्टिस और फुटपाथ पर सोया...' ऐसे 'हुनरबाज' बने आकाश सिंह
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कलर्स टीवी के हुनरबाज की ट्रॉफी जीतकर बिहार के आकाश सिंह ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि चाहे मुश्किल कितनी भी रहे, मेहनत और लगन सच्ची हो, तो सपने जरूर पूरे होते हैं.
बिहार के भागलपुर के आकाश सिंह हुनरबाज के विजेता बन चुके हैं. आकाश को ईनाम के रूप में 15 लाख रुपये कैश मिले हैं. अपनी इस सफलता की खुशी और स्ट्रगल की कहानी आकाश आजतक डॉट इन से शेयर करते हैं.
अपनी जीत की खुशी शेयर करते हुए आकाश कहते हैं, मेरे परिवार-दोस्तों के लगातार कॉल्स आ रहे हैं. अभी तक बात नहीं हो पाई है. परिवार वाले चाहते थे कि मैं पढ़ लिखकर कोई नौकरी कर लूं. घर की फाइनैंसियल कंडीशन भी ठीक नहीं थी. जब वे मुझे डांस करता देखते, तो कहते कि बेटा कुछ काम कर हमारी मदद कर दे. उनको शायद मेरे टैलेंट पर भरोसा नहीं था लेकिन मैं अपने इस सपने को खोने नहीं देना चाहता था. उन्होंने मुझसे उम्मीदें छोड़ दी थीं और बस यही कहा था कि जो करना है करो. हालांकि रास्ता कैसे निकालना है, इसका कोई अंदाजा नहीं था. मेरे पास तो इतने पैसे भी नहीं थे कि मुंबई आकर स्ट्रगल कर सकूं. इसी बीच एक डांस रिएलिटी शो के लिए मैं सिलेक्ट हो गया था. 2018 में मुझे उसी चैनल की ओर मुंबई बुलाया गया. यहां आने के बाद उन्होंने मेरा कॉल लेना बंद कर दिया था. वापसी का कोई रास्ता नहीं था, मैंने सोच लिया कि अब आ गया हूं, तो वापस नहीं जाऊंगा, चाहे सड़कों पर ही क्यों न सोना पड़े.
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आकाश आगे कहते हैं, मुंबई में कोई मेरा अपना नहीं था. मैं यहां सड़कों पर रहा, जितने पैसे लेकर आया था, वो खत्म हो गए थे. रिएलिटी शो के चक्कर में आया था और वहां से मिले धोखे ने बहुत कुछ सिखा दिया था. मैं दादर के शिवाजी पार्क में रहा करता था, वहीं डांस प्रैक्टिस किया करता था. भूख लगने पर मंदिर और गुरूद्वारे के चक्कर काटता था. वहां से खाने का जुगाड़ कर लिया था. फिर मैंने वहां लोगों से दूध और पेपर बेचने का काम मांगा. सुबह ये काम कर वापस पार्क में प्रैक्टिस में लग जाता था. लगातार एक दो साल तक वैसा ही चला और फिर मुझे हुनरबाज में परफॉर्मेंस का मौका मिला. जब आपके पास कोई ऑप्शन नहीं होता है, तो कॉन्फिडेंस अपने आप आ जाता है. मैं परफॉर्म करता गया, लोगों को अच्छा लगने लगा. अब ट्रॉफी जीत गया हूं.
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हुनरबाज के दौरान अपनी जर्नी पर आकाश कहते हैं, मैं यहां परफॉर्म कर रहा था, तो मेरे पास इतने भी पैसे नहीं होते थे कि फैमिली वालों को बुलाकर यहां उनके सामने लाइव परफॉर्मेंस दूं. फिनाले के वक्त चैनल ही मेरे पैरेंट्स को लेकर आए हैं. उनके सामने जीता हूं, तो उनकी निराशाएं खत्म हो गई हैं. अब पापा और मां गर्व करते हैं. मां ने तो जब टीवी में पहली बार देखा था, तो कॉल कर बस रोए जा रही थी. अब जो ईनाम जीता है, उन पैसों से मैं अपने गांव की मिट्टी वाला घर को तोड़ पक्का मकान बनाऊंगा. मेरी जिंदगी में जितने भी पैसे व ईनाम मिलेंगे, सब अपने पैरेंट्स को न्यौछावर कर दूंगा.

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