
रूस और सऊदी अरब के एक फैसले ने कैसे अमेरिकी प्लान को किया फेल?
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जी-7 देशों ने दिसंबर 2022 में रूसी तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस कैप लगा दी थी. यानी रूस प्राइस कैप के तहत तय कीमत से महंगा तेल नहीं बेच पा रहा था. अमेरिका भी जी-7 समूह का सदस्य है, लेकिन रूस और सऊदी अरब के एक फैसले ने पूरे अमेरिकी प्लान को फेल कर दिया.
रूसी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. इसके अलावा, रूसी तेल पर प्राइस कैप लागू है. इसका मुख्य मकसद रूसी आय को कम करना है, ताकि यूक्रेन से युद्ध में इस्तेमाल किए जा रहे रूसी फंड में कमी आए.
लेकिन, सऊदी अरब और रूस के एक निर्णय ने पूरे अमेरिकी प्लान को फेल कर दिया है. दरअसल, सोमवार को ओपेक और रूस ने अपने तेल उत्पादन में प्रतिदिन लगभग 36 लाख बैरल की कटौती करने का फैसला किया है. ओपेक में सऊदी अरब का दबदबा माना जाता है. ओपेक प्लस देश प्रतिदिन लगभग 16 लाख बैरल तेल उत्पादन कम करेंगे.
इस फैसले के बाद ही तेल की कीमतें लगभग 6 प्रतिशत तक बढ़ गईं. अमेरिका और जी-7 देशों की ओर से लगाए गए प्राइस कैप के कारण अभी तक रूस 60 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा कीमत पर तेल नहीं बेच पा रहा था. लेकिन तेल उत्पादन में कटौती की घोषणा के बाद रूसी तेल की कीमत भी 60 डॉलर के पार हो गई और अमेरिका का प्राइस कैप धरा का धरा रह गया.
अमेरिका ने जब रूसी तेल पर प्राइस कैप लगाया था, तो रूस के तेल उत्पादन या राजस्व पर इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा था. क्योंकि रूसी यूराल तेल पहले से ही तय कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे कारोबार कर रहा था. लेकिन अब यूराल 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है, जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए एक झटका है.
जापान प्राइस कैप से ज्यादा कीमत पर खरीद रहा रूसी तेल
रूस से तेल खरीदने के कारण भारत की आलोचना करने वाला जापान भी तेल उत्पादन में कटौती के बाद रूस से तेल खरीद रहा है. उसमें भी जापान प्राइस कैप (60 डॉलर प्रति बैरल) से ज्यादा कीमत पर रूसी तेल खरीद रहा है. सफाई में जापान ने कहा है कि ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल खरीदना उसकी मजबूरी है. इसलिए इसे अपवाद माना जाए. यहां तक कि अमेरिका ने भी जापान को रूस से तेल खरीदने की अनुमति दे दी है.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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