
युद्ध की विभीषिकाः जंग की आग से बढ़ रहा जलवायु संकट
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हर युद्ध की क़ीमत चुकानी पड़ती है. यह न सिर्फ इंसानी ज़िंदगियां लेता है, बल्कि हमारी धरती को आने वाली पीढ़ी के लिए रहने लायक भी नहीं छोड़ता. पूरी दुनिया में इस समय 56 सक्रिय संघर्ष चल रहे हैं. इनमें 92 देश युद्ध में शामिल हैं, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से सबसे अधिक संख्या है. यह हमारे जलवायु को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है.
कहानी 20 साल के पॉल की है. जो पहले विश्वयुद्ध (1914-1918) में जर्मनी की सेना में शामिल होकर बेहद उत्साहित है. लेकिन उसके जोश का सामना जल्द ही जंग की हकीकत से होता है. युद्ध की खाइयों में बिताए गए जीवन, मौत और टूटती उम्मीदों के बीच वो कहता है, 'मैं तो अभी बीस साल का ही हूं, लेकिन जीवन को लेकर मेरे पास बस निराशा और मौत का ही अनुभव है.' कहानी पॉल की शांत मौत के साथ खत्म हो जाती है. जर्मन लेखक एरिक मारिया रेमार्क (Erich Maria Remarque) अपने उपन्यास 'ऑल क्वाइट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट' (All Quiet on the Western Front) में कुछ इस तरह युद्ध की विभीषिका को बयां करते हैं. शायद वह ऐसा इसलिए भी कर पाए, क्योंकि खुद पहले युद्ध के वेटरन रह चुके थे.
कहानी यहीं नहीं रूकती. फिर दूसरा विश्वयुद्ध हुआ. अब हम शायद तीसरे के मुहाने पर हैं. जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो ईरान ने भी जवाबी हमले शुरू किए. पलक झपकते यह युद्ध साइप्रस, लेबनान, इराक, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात, सीरिया, कतर और ओमान यानी 14 देशों तक फैल गया. ईरान ने इन सभी खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. हर साल प्रकाशित होने वाले ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में इस समय 56 सक्रिय संघर्ष चल रहे हैं. इनमें 92 देश युद्ध में शामिल हैं, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से सबसे अधिक संख्या है. पिछले 15 साल में यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और एशिया में सशस्त्र संघर्ष तकरीबन दोगुने हुए हैं. सब-सहारा अफ्रीका में तो 46 में से 36 देश अपनी सीमाओं के बाहर भी संघर्ष में शामिल हैं.
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लेकिन, कहते हैं न कि हर हिंसा की कीमत होती है. निजी और आर्थिक भी. लोकल और ग्लोबल भी. मानवीय नुकसान के लिहाज़ से देखें तो संघर्षों में बढ़ोतरी के कारण 2023 में लगभग 1,62,000 लोगों की मौत हुई. 2024 में यहीं आंकड़ा करीब 2,39,000 और 2025 में 2,40,000 हो गया. आर्थिक प्रभाव के मामले में इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस बताता है कि 2023 में ही वैश्विक स्तर पर हिंसा की लागत लगभग 1,73,28,99 करोड़ रुपये रही, जो दुनिया के कुल जीडीपी का लगभग 13.5% है.
दुनिया में होने वाले युद्ध सिर्फ जान-माल का ही नुकसान नहीं करते, बल्कि पर्यावरण और जलवायु पर भी भारी गहरा असर डालते हैं. ऐसा ही कुछ इजरायल–गाजा युद्ध में भी सामने आया है. जमीन के नीचे बिछी बारूदी सुरंगें, जहरीले रसायन और नष्ट हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र जैसे संघर्षों से होने वाली पर्यावरणीय तबाही के बारे में तो काफी जानकारी है, लेकिन युद्ध का ग्लोबल क्लाइमेट पर पड़ने वाला प्रभाव लंबे समय तक कम आंका गया.

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