
बाबरी मस्जिद विध्वंस के उदाहरण हटे, अब NCERT की किताबों में राम जन्मभूमि आंदोलन पढ़ेंगे छात्र
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एनसीईआरटी ने 12वीं पॉलिटिकल साइंस की नई किताब के अध्याय 8 में शामिल अयोध्या विध्वंस का संदर्भ हटा दिया है. साथ ही गुजरात दंगों के बारे में अब बताया गया है कि "दंगों में हर समुदाय के लोग मारे गए" और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बारे में अब बताया गया है कि ये असल में "भारतीय इलाका है जिसे पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है."
स्कूली छात्रों की किताबों से अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों के कुछ उदाहरण हटाए गए हैं. इसके अलावा हिंदुत्व के संदर्भ को हटाना और मणिपुर के भारत में विलय के संदर्भ में भी बदलाव किया गया है. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपनी किताबों में कई बदलाव करते हुए हाल के कुछ वर्षों में हुए संवेदशील विषयों को हटा दिया है.
12वीं पॉलिटिकल साइंस की किताब में हुए ये बदलाव
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीईआरटी ने 12वीं पॉलिटिकल साइंस की नई किताब के अध्याय 8 में शामिल अयोध्या विध्वंस के कुछ संदर्भ हटा दिए हैं. "राजनीतिक लामबंदी की प्रकृति के लिए राम जन्मभूमि आंदोलन और अयोध्या विध्वंस की विरासत क्या है?" इसे बदलकर "राम जन्मभूमि आंदोलन की विरासत क्या है?" कर दिया गया है. उसी अध्याय में बाबरी मस्जिद और हिंदुत्व की राजनीति के कुछ संदर्भ हटा दिए गए हैं.
पहले पैराग्राफ में लिखा था: "चौथा, कई घटनाओं की परिणति दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे (जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता है) के विध्वंस के रूप में हुई. इस घटना ने देश की राजनीति में विभिन्न बदलावों का प्रतीक और शुरुआत की और इस पर बहस तेज हो गई. भारतीय राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति. ये घटनाक्रम भाजपा और 'हिंदुत्व' की राजनीति के उदय से जुड़े हैं."
इसे इस प्रकार बदल दिया गया: "चौथा, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर पर सदियों पुराने कानूनी और राजनीतिक विवाद ने भारत की राजनीति को प्रभावित करना शुरू कर दिया जिसने विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों को जन्म दिया. राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन, केंद्रीय मुद्दा बन गया, जिसने दिशा बदल दी धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर चर्चा की परिणति सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले (9 नवंबर, 2019 को घोषित) के बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के रूप में हुई."
सिलेबस में बदलाव पर NCERT का तर्क

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