
बहुमत का बोझ... तारिक रहमान को मिला बांग्लादेश का ताज, साथ में भारी-भरकम चुनौतियां
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तारिक रहमान 18 साल निर्वासित रहने के बाद दो महीने पहले ही बांग्लादेश लौटे. फिर कुछ ही दिनों बाद उनकी मां और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया ने अंतिम सांस ली. करीब एक महीने से ज्यादा का भावुक इलेक्शन कैंपेन. जिसके नतीजे में अब उन्हें मिला है प्रचंड बहुमत. तारिक रहमान की जिंदगी में सबकुछ बहुत जल्दी हो रहा है. उन्हें उनके सामने खड़ी चुनौतियों का भी अंदाजा होगा ही.
बांग्लादेश की राजनीति में अगर तारिक रहमान दो तिहाई बहुमत लेकर भी सत्ता में आते हैं, तो पहली नजर में तस्वीर साफ दिखती है. भारी जनादेश. मजबूत सरकार. निर्णायक नेतृत्व. लेकिन जमीन की हकीकत इतनी सीधी नहीं है. बहुमत कागज पर ताकत देता है. बांग्लादेश में सत्ता संभालना और टिके रहना अलग बात होगी.
रहमान की पार्टी बांग्लादेश नशनलिस्ट पार्टी को चुनाव में 299 में से 212 सीटों पर जीत मिली है. जबकि यही बीएनपी लंबे समय से विपक्ष की राजनीति करती रही है. सड़कों पर आंदोलन. चुनावी बहिष्कार. सत्ता के खिलाफ तीखी बयानबाजी. अब अगर वही पार्टी सत्ता में आती है, तो उसे सिस्टम चलाना होगा. और यहीं से असली चुनौतियां शुरू होती हैं.
सबसे पहले घरेलू राजनीति की फाल्ट लाइंस. बांग्लादेश दशकों से दो खेमों में बंटा है. एक तरफ अवामी लीग. दूसरी तरफ बीएनपी. यह सिर्फ राजनीतिक बंटवारा नहीं है. यह विचारधारा, इतिहास और पहचान को लेकर भी खींचतान है. 1971 की विरासत पर दोनों का नजरिया अलग है. प्रशासनिक ढांचे में अवामी लीग का असर गहरा रहा है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौर में अवामी लीग से जमकर बदला लिया गया. यूं कहें कि हिसाब चुकाया गया. लीग से जुड़े नेताओं और समर्थकों को निशाना बनाया गया. मुजीबुर्रहमान का घर खंडहर कर दिया गया. कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन, क्या तारिक रहमान भी तल्खी को आगे बढ़ाएंगे? बांग्लादेश में अब भी अवामी लीग का एक बड़ा समर्थक वर्ग है, जिसने चुनाव में जमात के बजाय बीएनपी को ही वोट दिया है. अब बारी रहमान की हैं कि वे उन समर्थकों को अहसास कराएं कि वे हारे नहीं हैं. अवामी लीग का कैडर नेटवर्क मजबूत है. अगर वे सड़क पर उतरते हैं, तो टकराव बढ़ेगा. रहमान को समावेशी राजनीति दिखानी होगी. बदले की नहीं.
दूसरा बड़ा सवाल मजहबी कट्टरपंथ का है. बीएनपी का इतिहास बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन का रहा है. जमात पर 1971 के युद्ध अपराधों के आरोप लगे. उसके कई नेताओं को सजा हुई. अवामी लीग ने खुद को सेक्युलर ताकत के रूप में पेश किया. बीएनपी पर अक्सर आरोप लगा कि उसने इस्लामी ताकतों को राजनीतिक जगह दी. रहमान अब सत्ता में आए हैं, तो उन्हें तय करना होगा कि वे कट्टर ताकतों से दूरी रखेंगे या समझौता करेंगे. दूरी रखते हैं तो उनका पुराना वोट बैंक नाराज होगा. पास जाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा. दोनों रास्ते जोखिम भरे हैं. लेकिन, रहमान के सामने सिर्फ राजनीतिक हित साधने की ही चुनौती नहीं है, उन्हें बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं का भी ख्याल रखना है. जिनको लेकर कट्टरपंथी अपने दांत पीस रहे हैं.
तीसरा मोर्चा सेना और पुलिस से तालमेल का है. बांग्लादेश का इतिहास सैन्य हस्तक्षेप से अछूता नहीं रहा. 1975 के बाद कई बार सेना ने सीधे या परोक्ष रूप से सत्ता में भूमिका निभाई. भले आज लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत दिखे, लेकिन सेना का प्रभाव अब भी अहम है. शेख हसीना इसे बखूबी जानती थीं. इसलिए शासन में अपने अंतिम लम्हे तक उन्होंने इस संतुलन का साधकर रखा. अगर सरकार और सेना के बीच रहमान के शासन को लेकर भरोसे की कमी हुई, तो अस्थिरता का खतरा रहेगा. दो तिहाई बहुमत संसद में काम आता है. बैरक में नहीं.
चौथा बड़ा सवाल भारत से रिश्तों का है. पिछले डेढ़ दशक में ढाका और नई दिल्ली के रिश्ते बेहतर हुए. सीमा समझौते हुए. सुरक्षा सहयोग बढ़ा. उग्रवाद पर समन्वय हुआ. लेकिन बीएनपी की छवि भारत के प्रति सख्त रही है. रहमान को संतुलन साधना होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी पहल कर चुके हैं. चाहे वो रहमान की मां खालिदा जिया के स्वास्थ्य संबंधी ट्वीट हो या उनके निधन पर विदेश मंत्री जयशंकर को ढाका भेजने की. भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. चुनाव नतीजे के तुरंत बाद पीएम मोदी ने रहमान को शुभकामना दी, और दोपहर में फोन पर बात भी की. अगर रहमान घरेलू राजनीति के लिए भारत विरोधी रुख अपनाते हैं, तो व्यापार, बॉर्डर मैनेजमेंट और क्षेत्रीय सहयोग पर असर पड़ेगा. अगर वे रिश्ते सुधारते हैं, तो कट्टर समर्थक सवाल उठाएंगे. यह रस्साकशी आसान नहीं होगी.

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