
बस 20 दिन का इंतजार! खुलने जा रहे हैं केदारनाथ के कपाट, ऊखीमठ से कब रवाना होगी बाबा की गद्दी
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उत्तराखंड के केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल 2026 को सुबह 8 बजे श्रद्धालुओं के लिए खुलेंगे. बाबा केदार की पंचमुखी डोली 19 अप्रैल को शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ से रवाना होगी और 21 अप्रैल को केदारनाथ पहुंचेगी.
उत्तराखंड में स्थित चार धामों में से एक बाबा केदारनाथ के कपाट खुलने जा रहे हैं. केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल 2026 को सुबह 8 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे. यह घोषणा महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) पर की गई थी, जिसके बाद बाबा केदार की डोली के साथ पूजा-अर्चना के साथ यात्रा शुरू होगी.
पिछले साल (2025) केदारनाथ के कपाट 2 मई को खुले थे. तकरीबन छह महीने तक दर्शन-पूजन के बाद 23 अक्टूबर 2025 को शीतकाल के लिए बंद हो गए थे. शीतकाल में कपाट बंद होने के बाद बाबा केदार की गद्दी ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में विराजमान होती है और यही उनका पूजा स्थल बन जाता है.
कैसा है केदारनाथ का ज्योतिर्लिंग? केदारानाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहां महादेव शिव का ज्योतिर्लिंग बैल पृष्ठ यानी बैल के कूबड़ के उभरे हुए हिस्से जैसा है. इसीलिए यहां का शिवलिंग पारंपरिक तौर पर गोलाई लिए हुए नहीं दिखता बल्कि पिरामिड जैसी आकृति में त्रिकोण त्रिभुज या कुछ-कुछ प्रिज्म जैसा नजर आता है.
पांडवों से जुड़ी है कहानी कहते हैं कि पांडव जब युद्ध के बाद अपने पापों के प्रायश्चित के लिए तीर्थयात्रा पर निकले थे, तब वह भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे. लेकिन शिवजी उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे. इसलिए उन्हें खोजते हुए पांडव कई तीर्थों में गए लेकिन वहां महादेव नहीं मिले. जब पांडव काशी पहुंचे तब शिवजी पर्वत पर आ गए.
पांडव यहां भी पहुंच गए. तब शिवजी को भीम ने देख लिया, लेकिन शिव जी ने बैल का स्वरूप बनाया और उनके झुंड से होकर भागने लगे. तब भीम ने उनके कूबड़ को पकड़ लिया. शिव धरती में समाने लगे, लेकिन भीम की निष्ठा देखकर उन्होंने पांडवों को दर्शन दिए. भीम के पकड़ने से बैल के कूबड़ का हिस्सा ही ऊपर रह गया और शिवजी पांडवों की प्रार्थना पर इसी रूप में यहां स्थापित हो गए.
एक नहीं पांच हैं केदार पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि जब भगवान शिव बैल के रूप में आए तो उनके धड़ का भाग काठमांडू में प्रकट हुआ, जहां अब पशुपतिनाथ मंदिर है. शिवजी की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुई. इन चार स्थानों के साथ केदारनाथ धाम को मिलाकर पंचकेदार के रूप में पूजा जाता है.

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